एक दीपक जल रहा है,
दिक्-दिगंत प्रकाश को।
अपनी लौकिक शक्ति से,
सामूहिक विकास को।
सीमा हो सुरक्षित अपनी,
वचन पुख्ता चाहिए।
भीतरी गद्दारों से,
हिसाब चुकता चाहिए।
इसलिए हे हिन्दवासी!
स्नेह से सींचो इसे।
थोड़ा वक़्त और दो,
अति भार है दिया जिसे।
सादर-
डॉ. राजा राम यादव