क्या सच में हम स्वतंत्र हो गए हैं!!
वस्तुतः स्वतंत्रता दो स्तरों पर अनुभूत होती है। वैयक्तिक रूप से आत्मा के स्तर पर और सामूहिक रुप से समुदाय के स्तर पर। जहां एक तरफ दैहिक, धार्मिक और आर्थिक स्वतंत्रता हमें व्यक्तिगत रूप से प्रभावित करती हैं वहीं सामाजिक और राजनैतिक स्वतंत्रता समूह के स्तर पर हमारे सामुदायिक जीवन पर प्रभाव डालती है। स्वतंत्रता अर्थात आज़ादी; इस छोटे-से शब्द में संसार का सारा विभु और समस्त ऐश्वर्य व्याप्त है। आज़ादी किसी भी कीमत पर मिले, सस्ती ही है।
क्या अशिक्षा से निजात मिल गई, क्या विद्यालयों-महाविद्यालयों में अपने मनपसंद और रोजगारपरक विषय चुनने की आज़ादी मिल गई, क्या जनसंख्या के बढ़ते बोझ से आज़ादी मिल गई, क्या गरीबों को, आए दिन और गरीब होने की अधोगामी गति से मुक्ति मिल गई, क्या जनता को विदेशी मानसिकता से युक्त प्रशासन-प्रणाली से आज़ादी मिल गई, क्या एक राष्ट्र - एक राष्ट्रभाषा का सपना साकार हो पाया, क्या आम जन की भाषा, राष्ट्र की भाषा बन सकी, क्या जनता में उसके स्वयं को शासक होने का भाव जागृत हो सका, क्या तिरंगे में लिपटी सपूतों की लाशें आने का सिलसिला थम गया आदि ऐसे सवाल हैं जो अभी भी मुँह बाए खड़े हैं। इन सवालों के जवाब तलाशे बिना आज़ादी की सार्थकता सिद्ध नहीं हो सकती।
परन्तु हाँ, आज़ादी तो मिली है- खुले आम नियमों और कायदे-कानूनों की धज्जियां उड़ाने की, सरकारी नीतियों का अनुसरण करने के बजाय उसकी जमकर आलोचना करने की, अभिव्यक्ति की आज़ादी के नाम पर देश के टुकड़े करने वाले नारे लगाने की, सरकारी प्रतिष्ठानों और इमारतों की संरक्षा के बजाय इसे नुकसान पहुंचाने की, सरकारी ज़मीनों पर अनाधिकृत कब्जा जमाने की, सड़क पर कूड़ा और सर्वत्र गन्दगी फैलाने की, मौका मिलते ही अपनी जेबें भरने की, सत्तालोलुपता की अपनी छटपटाहट को सरेआम जाहिर करने की, जात-बिरादरी और मजहब के नाम पर नफरत फैलाने की, अपनी अक्षमताओं और अकर्मण्यता का ठीकरा व्यवस्था और सरकार के माथे फोड़ने की। क्या सही मायने में यही आज़ादी है!
इसलिए आइए, विचार करें कि हम स्वयं को किस अनुरूप ढाल पाए हैं! क्या स्वतंत्रता की हिफाजत के लिए हम अपना योगदान कर पाए हैं! क्या आज़ादी की असली कीमत का भान हमें हो पाया है और इसे अक्षुण्ण रखने के लिए हम अपने हिस्से का भाग अर्पित कर सके हैं! सतत स्मरण रहे-
"ऊंची हुई मशाल हमारी, आगे कठिन डगर है।
शत्रु हट गया लेकिन, उसकी छायाओं का डर है।
जन गंगा में ज्वार, लहर तुम प्रवहमान रहना ,
पहरुए सावधान रहना। पहरुए सावधान रहना।"
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डॉ. राजा राम यादव
15.8.2018