क्या कहें ?
क्या न कहें !
वस्तुतः
साहित्य जनसमूह के हृदय का विस्तार
है। इसलिए आवश्यक है कि यह सकारात्मक और सार्थक हो। कुछ
भी कहने से पहले सोचना जरूरी है। ‘क्या कहना है?’ से
अधिक आवश्यक यह जानना है कि ‘क्या
नहीं कहना है?’
क्या लिखना है से अधिक जरूरी है कि क्या नहीं
लिखा जाए। उपयुक्त विषय पर सारगर्भित,
तथ्यपरक और ज्ञानवर्धक लेख, कविता, कहानी, रिपोर्ताज
आदि मनोरंजन के अतिरिक्त साहित्यिक समझ को विकसित करने मे भी अहम भूमिका निभाते
हैं।
साहित्य
की सार्थकता इस बात पर निर्भर है कि यह मनोरंजन
के अतिरिक्त सामाजिक का कितना मार्गदर्शन करता है। इसमें अतीत, वर्तमान और भविष्य तीनों को एक साथ झंकृत करने का कितना सामर्थ्य है। वास्तव में साहित्य वही है जिसमें
यथार्थ और आदर्श के सामंजस्य का प्रयत्न हो, सत्य और असत्य
के भेद का
प्रकटीकरण हो और कथ्य-अकथ्य
के ज्ञान का आग्रह हो। अतः आवश्यक
है कि बोलने से पहले दो बार सोचा जाए औऱ
लिखने से पहले 3 बार सोचा जाए क्योंकि हृदय की बात लिखित रूप में आने के पश्चात सहस्त्र
हृदयों तक पहुँच जाती है। इसलिए संत कबीर कहते हैं -
‘बोली
एक अनमोल है, जो
कोई बोलै जानि,
हिये
तराजू तौलि के, तब
मुख बाहर आनि।
डॉ. राजा राम यादव
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