यूजीसी-नेट : पात्रता बनाम योग्यता
पिछले कुछ दिनों से या यूँ कह लीजिए कुछ वर्षों से महाविद्यालय तथा विश्वविद्यालय प्रध्यापक पद हेतु यूजीसी-नेट परीक्षा उत्तीर्ण होने की अनिवार्यता को लेकर काफी घमासान देखने-सुनने को मिला। इस घमासान में अभ्यर्थियों के साथ-साथ सेवारत नकली प्राध्यापकों का उत्साह भी बुलंद नजर आया। परन्तु अफ़सोस कि यह उत्साह पी-एच.डी. धारकों के लिए यूजीसी-नेट परीक्षा से छूट को लेकर था। मामला उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय तक पहुँचा। न्यायालयों के फैसले के मद्देनजर मा. सर्वोच्च न्यायालय ने बहुत ही सटीक, सतर्क और सार्थक व्याख्या करते हुए 16 मार्च 2015 को नेट की अनिवार्यता और यूजीसी के अधिकारों के पक्ष में संतुलित फैसला दिया जो निस्संदेह स्वागतयोग्य है। इसके बावजूद महाविद्यालय/विश्वविद्यालय प्रबंधन अपनी अधूरी जानकारी और अपने हित के अनुरूप व्याख्या करने से बाज नहीं आ रहे हैं।
क्या पी-एच.डी. धारको के लिए नेट से छूट की आड़ में वे घिसट-घिसट कर चलने वाले अयोग्य उम्मीदवारों को मौका और योग्य उम्मीदवारों की प्रतिभा की बलि देकर इन शीर्ष संवैधानिक संस्थाओं को धोखा तो नहीं देना चाहते हैं? अथवा नेट-उत्तीर्ण अभ्यर्थियों का अकाल तो नहीं पड़ गया है देश में? क्या औद्योगिक संंस्थानों में अनुभवी और सुप्रशिक्षित लोगों की कमी हो गई है? क्या इस सन्दर्भ में नियुक्ति हेतु साक्षात्कार की पूरी प्रक्रिया को पारदर्शी बनाने हेतु विडिओग्राफी की व्यवस्था नहीं की जा सकती है? क्या विशेषज्ञों की इतनी किल्लत है देश में कि साक्षात्कार हेतु विशेषज्ञ दल में हर बार अलग-अलग व्यक्ति नहीं भेजकर कुछ गिने-चुने लोग ही भेजे जाते हैं? ये सारे सवाल अब भी जवाब के लिए लालायित हैं।
यूजीसी-नेट की परीक्षा अब सीबीएसई द्वारा आयोजित की जाती है। इसमें प्रथम पत्र सामान्य ज्ञान का होता है जो सबके लिए समान होता है। इसमें 60 प्रश्न होते हैं जिसमें से किन्हीं 50 के उत्तर अपेक्षित होते हैं वो भी बिना किसी नकारात्मक अंकन पद्धति के। परंतु 25 प्रश्नों के सही उत्तर देकर रिजल्ट की उम्मीद की जा सकती है। इसकी कठिनाई का स्तर इंटरमीडिएट होता है और एक सामान्य इंटरमीडिएट से अपेक्षा के अनुकूल रखा जाता है।
द्वितीय प्रश्न पत्र में विषय-विशेष से स्नातक स्तर के 50 बहुविकल्पी प्रश्न होते हैं जो एक साधारण ग्रेजुएट हल कर सकता है और तृतीय प्रश्न पत्र में विषय-विशेष से ही परास्नातक स्तर के 75 बहुविकल्पी प्रश्न होते हैं। इनमें से लगभग 60 प्रतिशत के प्रश्नों के सही उत्तर से ही रिजल्ट की उम्मीद की जा सकती है। फिर भी बहुत-से अभ्यर्थी और प्राध्यापक तरह-तरह के बहाने बनाकर और अपनी पी-एच.डी. की दुहाई देकर इससे छूट की वकालत करते हैं।
देश में विद्वानो की कभी कमी नहीं रही है; परन्तु 2009 के यूजीसी नियम के पहले पी-एच. डी. कैसे होती थी, यह सभी जानते हैं। यहाँ तक कि जो लोग ठीक से 'पी-एच. डी.' भी नहीं लिख सकते हैं, वे भी डॉक्टर साहब बन गए। भाई आप डॉक्टर साहब हैं तो डॉक्टरी का प्रमाण तो दीजिए।
क्या प्राध्यापक पद के उम्मीदवारों के लिए यह उचित नहीं होगा कि नेट परीक्षा से छूट के लिए बहाने बनाने के बजाए वे थोड़ी तैयारी करके नेट उत्तीर्ण कर लें ? इससे एक साथ तीन-तीन फायदे होंगे-
पहला तो वे स्वयं लाभान्वित होंगे। अपेक्षित ज्ञान तथा कौशल हासिल कर आत्मविश्वास से लबरेज होंगे जिससे शिक्षकों की योग्यताओं पर लोगों का विश्वास बना रहेगा। दूसरा- शैक्षणिक जगत में एकरूपता आएगी और एक अनुकरणीय तथा सार्थक सन्देश जाएगा। तीसरा- यूजीसी और सर्वोच्च न्यायालय जैसी शीर्ष एवं प्रतिष्ठित संवैधानिक संस्थाओं के आदेशों (मंशा) का भी सम्मान हो जाएगा।
उम्मीद की जा सकती है कि हमारे प्रबुद्ध अभ्यर्थी और महाविद्यालय/विश्वविद्यालय प्रबंधन, आदर्श स्थापित करने के अपने प्रयास में सफल होंगे।
- - -