Monday, 20 March 2017

क्या कहें ? क्या न कहें !

क्या कहें ? क्या न कहें !
      वस्तुतः साहित्य जनसमूह के हृदय का विस्तार है। इसलिए आवश्यक है कि यह सकारात्मक और सार्थक हो। कुछ भी कहने से पहले सोचना जरूरी है। क्या कहना है?’ से अधिक आवश्यक यह जानना है कि क्या नहीं कहना है?’ क्या लिखना है से अधिक जरूरी है कि क्या नहीं लिखा जाए। उपयुक्त विषय पर सारगर्भित, तथ्यपरक और ज्ञानवर्धक लेख, कविता, कहानी, रिपोर्ताज आदि मनोरंजन के अतिरिक्त साहित्यिक समझ को विकसित करने मे भी अहम भूमिका निभाते हैं।      
      साहित्य की सार्थकता इस बात पर निर्भर है कि यह मनोरंजन के अतिरिक्त सामाजिक का कितना मार्गदर्शन करता है। इसमें अतीत, वर्तमान और भविष्य तीनों को एक साथ झंकृत करने का कितना सामर्थ्य है। वास्तव में साहित्य वही है जिसमें यथार्थ और आदर्श के सामंजस्य का प्रयत्न हो, सत्य और सत्य के भेद का प्रकटीकरण हो और कथ्य-कथ्य के ज्ञान का आग्रह हो। अतः आवश्यक है कि बोलने से पहले दो बार सोचा जाए औऱ लिखने से पहले 3 बार सोचा जाए क्योंकि हृदय की बात लिखित रूप में आने के पश्चात सहस्त्र हृदयों तक पहुँच जाती है। इसलिए संत कबीर कहते हैं -
बोली एक अनमोल है, जो कोई बोलै जानि,
हिये तराजू तौलि के, तब मुख बाहर आनि।

डॉ. राजा राम यादव

Sunday, 26 February 2017

यूजीसी-नेट : पात्रता बनाम योग्यता

यूजीसी-नेट : पात्रता बनाम योग्यता 
       पिछले कुछ दिनों से या यूँ कह लीजिए कुछ वर्षों से महाविद्यालय तथा विश्वविद्यालय प्रध्यापक पद हेतु यूजीसी-नेट परीक्षा उत्तीर्ण होने की अनिवार्यता को लेकर काफी घमासान देखने-सुनने को मिला। इस घमासान में अभ्यर्थियों के साथ-साथ सेवारत नकली प्राध्यापकों का उत्साह भी बुलंद नजर आया। परन्तु अफ़सोस कि यह उत्साह पी-एच.डी. धारकों के लिए यूजीसी-नेट परीक्षा से छूट को लेकर था। मामला उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय तक पहुँचा। न्यायालयों के फैसले के मद्देनजर मा. सर्वोच्च न्यायालय ने बहुत ही सटीक, सतर्क और सार्थक व्याख्या करते हुए 16 मार्च 2015 को नेट की अनिवार्यता और यूजीसी के अधिकारों के पक्ष में संतुलित फैसला दिया जो निस्संदेह स्वागतयोग्य है। इसके बावजूद महाविद्यालय/विश्वविद्यालय प्रबंधन अपनी अधूरी जानकारी और अपने हित के अनुरूप व्याख्या करने से बाज नहीं आ रहे हैं। 

       क्या पी-एच.डी. धारको के लिए नेट से छूट की आड़ में वे घिसट-घिसट कर चलने वाले अयोग्य उम्मीदवारों को मौका और योग्य उम्मीदवारों की प्रतिभा की बलि देकर इन शीर्ष संवैधानिक संस्थाओं को धोखा तो नहीं देना चाहते हैं? अथवा नेट-उत्तीर्ण अभ्यर्थियों का अकाल तो नहीं पड़ गया है देश में? क्या औद्योगिक संंस्थानों में अनुभवी और सुप्रशिक्षित लोगों की कमी हो गई है?  क्या इस सन्दर्भ में नियुक्ति हेतु साक्षात्कार की पूरी प्रक्रिया को पारदर्शी बनाने हेतु विडिओग्राफी की व्यवस्था नहीं की जा सकती है? क्या विशेषज्ञों की इतनी किल्लत है देश में कि साक्षात्कार हेतु विशेषज्ञ दल में हर बार अलग-अलग व्यक्ति नहीं भेजकर कुछ गिने-चुने लोग ही भेजे जाते हैं? ये सारे सवाल अब भी जवाब के लिए लालायित हैं।

      यूजीसी-नेट की परीक्षा अब सीबीएसई द्वारा आयोजित की जाती है। इसमें प्रथम पत्र सामान्य ज्ञान का होता है जो सबके लिए समान होता है।  इसमें 60  प्रश्न होते हैं जिसमें से किन्हीं 50 के उत्तर अपेक्षित होते हैं वो भी बिना किसी नकारात्मक अंकन पद्धति के। परंतु 25 प्रश्नों के सही उत्तर देकर रिजल्ट की उम्मीद की जा सकती है।  इसकी कठिनाई का स्तर इंटरमीडिएट होता है और एक सामान्य इंटरमीडिएट से अपेक्षा के अनुकूल रखा जाता है। 

       द्वितीय प्रश्न पत्र में विषय-विशेष से स्नातक स्तर के 50 बहुविकल्पी प्रश्न होते हैं जो एक साधारण ग्रेजुएट हल कर सकता है और तृतीय प्रश्न पत्र में विषय-विशेष से ही परास्नातक स्तर के 75 बहुविकल्पी प्रश्न होते हैं।  इनमें से लगभग 60 प्रतिशत के प्रश्नों के सही उत्तर से ही रिजल्ट की उम्मीद की जा सकती है। फिर भी बहुत-से अभ्यर्थी और प्राध्यापक तरह-तरह के बहाने बनाकर और अपनी पी-एच.डी. की दुहाई देकर इससे छूट की वकालत करते हैं।

       देश में विद्वानो की कभी कमी नहीं रही है; परन्तु 2009 के यूजीसी नियम के पहले पी-एच. डी. कैसे होती थी, यह सभी जानते हैं। यहाँ तक कि जो लोग ठीक से 'पी-एच. डी.' भी नहीं लिख सकते हैं, वे भी डॉक्टर साहब बन गए। भाई आप डॉक्टर साहब हैं तो डॉक्टरी का प्रमाण तो दीजिए।

     क्या प्राध्यापक पद के उम्मीदवारों के लिए यह उचित नहीं होगा कि नेट परीक्षा से छूट के लिए बहाने बनाने के बजाए वे थोड़ी तैयारी करके नेट उत्तीर्ण कर लें ? इससे एक साथ तीन-तीन फायदे होंगे-
पहला तो वे स्वयं लाभान्वित होंगे। अपेक्षित ज्ञान तथा कौशल हासिल कर आत्मविश्वास से लबरेज होंगे जिससे शिक्षकों की योग्यताओं पर लोगों का विश्वास बना रहेगा।  दूसरा- शैक्षणिक जगत में एकरूपता आएगी और एक अनुकरणीय तथा सार्थक सन्देश जाएगा।  तीसरा- यूजीसी और सर्वोच्च न्यायालय जैसी शीर्ष एवं प्रतिष्ठित संवैधानिक संस्थाओं के आदेशों (मंशा) का भी सम्मान हो जाएगा।

उम्मीद की जा सकती है कि हमारे प्रबुद्ध अभ्यर्थी और महाविद्यालय/विश्वविद्यालय प्रबंधन, आदर्श स्थापित करने के अपने प्रयास में सफल होंगे।
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डॉ. राजा राम यादव
चलभाष-9911894311
ई-मेल- rainbowtc@gmail.com

Monday, 20 February 2017

कोई दीपक

एक दीपक लड़ रहा है,
अनवरत अंधियारों से।
लड़ रहा है कालिमा के,
क्रूरतम परिवारों से।

सूर्य की अगली किरण तक,
युद्ध यह चलता रहे।
इसलिए अनिवार्य है कि
'दीप' यह जलता रहे।

Monday, 21 November 2016

एक दीपक

एक दीपक जल रहा है,
दिक्-दिगंत प्रकाश को।
अपनी लौकिक शक्ति से,
सामूहिक विकास को।

सीमा हो सुरक्षित अपनी,
वचन पुख्ता चाहिए।
भीतरी गद्दारों से,
हिसाब चुकता चाहिए।

इसलिए हे हिन्दवासी!
स्नेह से सींचो इसे।
थोड़ा वक़्त और दो,
अति भार है दिया जिसे।

सादर-
डॉ. राजा राम यादव

Monday, 14 November 2016

नोट बंदी एक ऐतिहासिक साहसिक कदम


निस्संदेह यह कठिन घड़ी है और हमें बुद्धि-विवेक से काम लेना होगा। याद रखें  कि जीने-खाने, शादी-विवाह, हँसी-ख़ुशी के लिए अधिक पैसों की जरूरत नहीं पड़ती है पर दिखावे/शोऑफ के लिए कितनी भी राशि कम पड़ेगी। इसलिए खुश रहें और खुशियां बांटें, दर्द और उदासी नहीं। हाय-तौबा मचाने की जरूरत नही है। हम-आप समझते ही हैं कि कुछ लोग डर से, कुछ शौक से, कुछ पैसों/कमीशन की लालच में, कुछ दूसरों के कहने पर और कुछ फोटो खिंचाने तथा सुर्खियां बटोरने बैंक आ रहे  हैं। इसी वजह से कई जरुतमंदों को भी पैसा नही मिल पा रहा है।
कितना ही अच्छा हो कि हम अब भी समझ जाएं कि हमने किसी खिलौने को प्रधानमंत्री नहीं बनाया है जो मदारी के डमरू पर डांस करे। वह तो भ्रष्टाचारियों के विरुद्ध महाप्रलय का शंख फूंक चुके हैं और इसकी गर्जना से बेईमानो का दिल दहल रहा है। हमें ईमानदारी से जीने की आदत डालनी ही पड़ेगी और अपनी अगली पीढ़ी की खुशहाल जिंदगी तथा सुरक्षित भविष्य की खातिर थोड़ी परेशानी उठानी ही पड़ेगी।
वर्तमान समस्या के कुछ उपाय इस प्रकार हैं-
1. निहायत जरूरी हो तभी पैसा निकालने या डालने बैंक/एटीएम जाएं।
2. भीड़ छंटने तक दूध/राशन आदि के लिए उधार/क्रेडिट कार्ड का प्रयोग करें।
3. पेट्रोल भराने और सभी प्रकार के बिलों का भुगतान क्रेडिट कार्ड से करें।
4. मनी ट्रांसफर के लिए NEFT/IMPS का प्रयोग करें।
5. कमीशन की लालच में न पड़ें और अपने सम्पर्क के लोगो को भी सचेत करें। गहराई से विचार करें तो आपकी हर छोटी-बड़ी समस्या का समाधान आपके इर्द-गिर्द ही मिल जाएगा।
6. दूसरों का पैसा अपने खाते में न डालें, न ही अपनी गाढ़ी कमाई के हजार/पाँच सौ के नोटों को कम कीमत पर किसी को दें। इन्हें 30 दिसम्बर से पहले अपने खाते में जमा कराएं, डेढ़ महीने का लंबा समय शेष है।
7. जिन्हें गहरा आघात लगा है वे अपने चमचों को उकसाकर माहौल को बिगाड़ने का घिनौना प्रयास भी कर सकते हैं अतः किसी प्रकार के उकसावे/अफवाह से बचें।
8. याद रखें कि कोई भी समस्या हमेशा-हमेशा के लिए नही होती। यह तूफ़ान भी चला जाएगा। आपके जायज धन को आपसे कोई नही छीन सकता है।
9. धैर्य रखें थोड़े दिनों में सब नॉर्मल हो जाएगा फिर आपको अपने योगदान पर गर्व होगा।
10. राष्ट्र निर्माण के महायज्ञ में अपने हिस्से की आहुति अवश्य अर्पित करें।
God bless all of us.
जय हिंद।

Sunday, 25 September 2016

हिंदी : हिंद का वाङ्गमय

हिंदी जन की भाषा है;
हिंदी जन की साँस।
हिंद की परिभाषा यह;
हिंदी जग की आस।।