Friday, 23 November 2018

पार्टी एन्जॉय करें - प्लेट जाया न करें!

पार्टी एन्जॉय करें - प्लेट जाया न करें!

         शादी, पार्टी आदि में प्रायः बुफ़े की व्यवस्था होती है जिसमें मेज़बान को प्लेट की गिनती के हिसाब से पेमेंट करना पड़ता है। परंतु हम कभी इस पर विचार नहीं करते हैं! अक्सर हम एक से अधिक प्लेट में खाना खाते हैं। कुछ लोग तो तीन-तीन, चार-चार प्लेट भी यूज कर लेते हैं। आप खाना तो उतना ही खा रहे हैं मगर बेचारे मेज़बान को 1 व्यक्ति के लिए 2-3 लोगों का पेमेंट देना पड़ता है। क्या यह मेज़बान के साथ ज्यादती और अन्याय नहीं है?

          यदि आप किसी होटल में खाना खाते हैं और आपसे उतने ही खाने का 3 गुना पैसा मांगा जाए तो आपको कैसा लगेगा? पार्टी में मेज़बान को उतने ही खाना के लिए 3 गुना या 4 गुना पेमेन्ट के लिए क्यों मज़बूर करते हैं? विचार कीजिए! आप जागरूक रहें और महिलाओं व अपने बच्चों को भी इसके लिए जागरूक करें कि वे एक-एक ही प्लेट का इस्तेमाल करें।

        एक व्यक्ति एक ही प्लेट में तो खा ही सकता है। एक आइटम खाकर, प्लेट फेंक कर दूसरी प्लेट निकालने की हमारी आदत बेचारे मेज़बान को कितनी महंगी पड़ती है, यह हम कभी सोचने की ज़रूरत ही नहीं समझते हैं! और, बेचारा मेज़बान किसी को कुछ नहीं कहता। वह चुपचाप हमारी लापरवाही का एकस्ट्रा पेमेंट कर देता है। वह हम सबके सामने हाथ जोड़कर खड़ा रहता है और विनती करता है कि हम पार्टी का आनंद लें। लेकिन हम कैसा आनंद लेते हैं! थोड़ी-सी लापरवाही के कारण हम उसको कई गुना ज़्यादा पेमेन्ट करने के लिए मज़बूर कर देते हैं।

        अतः हम पार्टी का भरपूर आनंद लें। भरपेट खाना खाएं। मगर थोड़ी-सी समझदारी दिखाते हुए मेज़बान का सहयोग करें। ध्यान रहे, गिनती सबसे बड़ी वाली प्लेट यानि डाइनिंग प्लेट की होती है जिसमें रोटी, चावल, सब्जी, पापड़, पुलाव इत्यादि खाते हैं। छोटी वाली टी-प्लेट, दोना-पत्तल या डिस्पोजेबल की गिनती नहीं होती है। यानी आप इन डिस्पोज़ेबल या छोटी वाली प्लेटों में स्टार्टर, स्वीट-डिश और आइसक्रीम आदि कितनी भी बार ले सकते हैं। इससे मेजबान के बजट पर कोई असर नहीं पड़ेगा। आशा है आप इस संदेश का असली मकसद ज़रूर समझ गए होंगे और पार्टी-भोज आदि में एक से अधिक डाइनिंग प्लेट (सबसे बड़ी वाली प्लेट) का इस्तेमाल नहीं करेंगे साथ ही दूसरों को भी इसके लिए प्रेरित करेंगे।

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डॉ. राजा राम यादव
21.11.2018

Friday, 17 August 2018

क्या सच में हम स्वतंत्र हो गए हैं !!


क्या सच में हम स्वतंत्र हो गए हैं!!

     वस्तुतः स्वतंत्रता दो स्तरों पर अनुभूत होती है। वैयक्तिक रूप से आत्मा के स्तर पर और सामूहिक रुप से समुदाय के स्तर पर। जहां एक तरफ दैहिक, धार्मिक और आर्थिक स्वतंत्रता हमें व्यक्तिगत रूप से प्रभावित करती हैं वहीं सामाजिक और राजनैतिक स्वतंत्रता समूह के स्तर पर हमारे सामुदायिक जीवन पर प्रभाव डालती है। स्वतंत्रता अर्थात आज़ादी; इस छोटे-से शब्द में संसार का सारा विभु और समस्त ऐश्वर्य व्याप्त है। आज़ादी किसी भी कीमत पर मिले, सस्ती ही है।

      क्या अशिक्षा से निजात मिल गई, क्या विद्यालयों-महाविद्यालयों में अपने मनपसंद और रोजगारपरक विषय चुनने की आज़ादी मिल गई, क्या जनसंख्या के बढ़ते बोझ से आज़ादी मिल गई, क्या गरीबों को, आए दिन और गरीब होने की अधोगामी गति से मुक्ति मिल गई, क्या जनता को विदेशी मानसिकता से युक्त प्रशासन-प्रणाली से आज़ादी मिल गई, क्या एक राष्ट्र - एक राष्ट्रभाषा का सपना साकार हो पाया, क्या आम जन की भाषा, राष्ट्र की भाषा बन सकी, क्या जनता में उसके स्वयं को शासक होने का भाव जागृत हो सका, क्या तिरंगे में लिपटी सपूतों की लाशें आने का सिलसिला थम गया आदि ऐसे सवाल हैं जो अभी भी मुँह बाए खड़े हैं। इन सवालों के जवाब तलाशे बिना आज़ादी की सार्थकता सिद्ध नहीं हो सकती।

     परन्तु हाँ, आज़ादी तो मिली है- खुले आम नियमों और कायदे-कानूनों की धज्जियां उड़ाने की, सरकारी नीतियों का अनुसरण करने के बजाय उसकी जमकर आलोचना करने की, अभिव्यक्ति की आज़ादी के नाम पर देश के टुकड़े करने वाले नारे लगाने की, सरकारी प्रतिष्ठानों और इमारतों की संरक्षा के बजाय इसे नुकसान पहुंचाने की, सरकारी ज़मीनों पर अनाधिकृत कब्जा जमाने की, सड़क पर कूड़ा और सर्वत्र गन्दगी फैलाने की, मौका मिलते ही अपनी जेबें भरने की, सत्तालोलुपता की अपनी छटपटाहट को सरेआम जाहिर करने की, जात-बिरादरी और मजहब के नाम पर नफरत फैलाने की, अपनी अक्षमताओं और अकर्मण्यता का ठीकरा व्यवस्था और सरकार के माथे फोड़ने की। क्या सही मायने में यही आज़ादी है!

     इसलिए आइए, विचार करें कि हम स्वयं को किस अनुरूप ढाल पाए हैं! क्या स्वतंत्रता की हिफाजत के लिए हम अपना योगदान कर पाए हैं! क्या आज़ादी की असली कीमत का भान हमें हो पाया है और इसे अक्षुण्ण रखने के लिए हम अपने हिस्से का भाग अर्पित कर सके हैं! सतत स्मरण रहे-

"ऊंची हुई मशाल हमारी, आगे कठिन डगर है।
शत्रु हट गया लेकिन, उसकी छायाओं का डर है।
जन गंगा में ज्वार, लहर तुम प्रवहमान रहना ,
पहरुए सावधान रहना। पहरुए सावधान रहना।"
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डॉ. राजा राम यादव
15.8.2018

Thursday, 25 January 2018

फ़िल्म पद्मावत - एक  बेबुनियाद विरोध

फ़िल्म पद्मावत - एक  बेबुनियाद विरोध

      इतिहासकार, फ़िल्म समीक्षक और न्यूज़ नेशन की टीम के साथ फ़िल्म पद्मावत की स्क्रीनिंग में शरीक होने का अवसर मिला। जो कुछ भी नकारात्मक बातें इस फ़िल्म के संबंध में मैंने अपने कानों से सुन रखी थी; अपनी आंखों से देखने के बाद वे सारी बातें निर्मूल, निराधार और कोरी कल्पना साबित हुई। इस फ़िल्म में ऐसा कुछ भी नहीं है जिससे राजपूती शान में किसी तरह का कोई बट्टा लगे। मैं तो कहूंगा कि यह फ़िल्म राजपूतों की ही नहीं बल्कि हिन्दू समाज की शौर्य गाथा का और अधिक ऊंचे स्वर में गायन है। 

          इस फ़िल्म में राजपूत क्षत्राणी तीरंदाजी करती दिखाई गई हैं। उन्हें विदुषी, युद्ध कला में निपुण, राजनीति में निष्णात, कूटनीति में दक्ष और अपनी आन-बान और शान की खातिर सम्पूर्ण बलिदान देने को तत्पर वीरांगना के रूप में दिखाया गया है। राजपूत समाज अपने शौर्य और पराक्रम के लिए सदैव प्रसिद्ध रहा है। वे शत्रु के भी आत्मीय निमंत्रण पर निहत्थे होकर जाते हैं। वे अपने जीवन-मूल्य की रक्षा के लिए अपना सर्वस्व समर्पित करने को तैयार हैं।

      इस फ़िल्म को देखकर आपके अंदर इतिहास को समझने की ललक पैदा होगी और सत्य का अनुसंधान करने की दृष्टि विकसित होगी जिससे न केवल आप अपने गौरवशाली इतिहास की ओर आकृष्ट होंगें बल्कि अपनी प्राचीन भूलों को सुधारकर नवीन जीवन मूल्य स्थापित कर सकेंगे।

        एकबार अवश्य देखिए। बिना देखे टिप्पणी मत कीजिए; विरोध तो बहुत दूर की बात है।
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डॉ. राजा राम यादव
मोब. - 9911894311
23.01.2018

Monday, 20 March 2017

क्या कहें ? क्या न कहें !

क्या कहें ? क्या न कहें !
      वस्तुतः साहित्य जनसमूह के हृदय का विस्तार है। इसलिए आवश्यक है कि यह सकारात्मक और सार्थक हो। कुछ भी कहने से पहले सोचना जरूरी है। क्या कहना है?’ से अधिक आवश्यक यह जानना है कि क्या नहीं कहना है?’ क्या लिखना है से अधिक जरूरी है कि क्या नहीं लिखा जाए। उपयुक्त विषय पर सारगर्भित, तथ्यपरक और ज्ञानवर्धक लेख, कविता, कहानी, रिपोर्ताज आदि मनोरंजन के अतिरिक्त साहित्यिक समझ को विकसित करने मे भी अहम भूमिका निभाते हैं।      
      साहित्य की सार्थकता इस बात पर निर्भर है कि यह मनोरंजन के अतिरिक्त सामाजिक का कितना मार्गदर्शन करता है। इसमें अतीत, वर्तमान और भविष्य तीनों को एक साथ झंकृत करने का कितना सामर्थ्य है। वास्तव में साहित्य वही है जिसमें यथार्थ और आदर्श के सामंजस्य का प्रयत्न हो, सत्य और सत्य के भेद का प्रकटीकरण हो और कथ्य-कथ्य के ज्ञान का आग्रह हो। अतः आवश्यक है कि बोलने से पहले दो बार सोचा जाए औऱ लिखने से पहले 3 बार सोचा जाए क्योंकि हृदय की बात लिखित रूप में आने के पश्चात सहस्त्र हृदयों तक पहुँच जाती है। इसलिए संत कबीर कहते हैं -
बोली एक अनमोल है, जो कोई बोलै जानि,
हिये तराजू तौलि के, तब मुख बाहर आनि।

डॉ. राजा राम यादव

Sunday, 26 February 2017

यूजीसी-नेट : पात्रता बनाम योग्यता

यूजीसी-नेट : पात्रता बनाम योग्यता 
       पिछले कुछ दिनों से या यूँ कह लीजिए कुछ वर्षों से महाविद्यालय तथा विश्वविद्यालय प्रध्यापक पद हेतु यूजीसी-नेट परीक्षा उत्तीर्ण होने की अनिवार्यता को लेकर काफी घमासान देखने-सुनने को मिला। इस घमासान में अभ्यर्थियों के साथ-साथ सेवारत नकली प्राध्यापकों का उत्साह भी बुलंद नजर आया। परन्तु अफ़सोस कि यह उत्साह पी-एच.डी. धारकों के लिए यूजीसी-नेट परीक्षा से छूट को लेकर था। मामला उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय तक पहुँचा। न्यायालयों के फैसले के मद्देनजर मा. सर्वोच्च न्यायालय ने बहुत ही सटीक, सतर्क और सार्थक व्याख्या करते हुए 16 मार्च 2015 को नेट की अनिवार्यता और यूजीसी के अधिकारों के पक्ष में संतुलित फैसला दिया जो निस्संदेह स्वागतयोग्य है। इसके बावजूद महाविद्यालय/विश्वविद्यालय प्रबंधन अपनी अधूरी जानकारी और अपने हित के अनुरूप व्याख्या करने से बाज नहीं आ रहे हैं। 

       क्या पी-एच.डी. धारको के लिए नेट से छूट की आड़ में वे घिसट-घिसट कर चलने वाले अयोग्य उम्मीदवारों को मौका और योग्य उम्मीदवारों की प्रतिभा की बलि देकर इन शीर्ष संवैधानिक संस्थाओं को धोखा तो नहीं देना चाहते हैं? अथवा नेट-उत्तीर्ण अभ्यर्थियों का अकाल तो नहीं पड़ गया है देश में? क्या औद्योगिक संंस्थानों में अनुभवी और सुप्रशिक्षित लोगों की कमी हो गई है?  क्या इस सन्दर्भ में नियुक्ति हेतु साक्षात्कार की पूरी प्रक्रिया को पारदर्शी बनाने हेतु विडिओग्राफी की व्यवस्था नहीं की जा सकती है? क्या विशेषज्ञों की इतनी किल्लत है देश में कि साक्षात्कार हेतु विशेषज्ञ दल में हर बार अलग-अलग व्यक्ति नहीं भेजकर कुछ गिने-चुने लोग ही भेजे जाते हैं? ये सारे सवाल अब भी जवाब के लिए लालायित हैं।

      यूजीसी-नेट की परीक्षा अब सीबीएसई द्वारा आयोजित की जाती है। इसमें प्रथम पत्र सामान्य ज्ञान का होता है जो सबके लिए समान होता है।  इसमें 60  प्रश्न होते हैं जिसमें से किन्हीं 50 के उत्तर अपेक्षित होते हैं वो भी बिना किसी नकारात्मक अंकन पद्धति के। परंतु 25 प्रश्नों के सही उत्तर देकर रिजल्ट की उम्मीद की जा सकती है।  इसकी कठिनाई का स्तर इंटरमीडिएट होता है और एक सामान्य इंटरमीडिएट से अपेक्षा के अनुकूल रखा जाता है। 

       द्वितीय प्रश्न पत्र में विषय-विशेष से स्नातक स्तर के 50 बहुविकल्पी प्रश्न होते हैं जो एक साधारण ग्रेजुएट हल कर सकता है और तृतीय प्रश्न पत्र में विषय-विशेष से ही परास्नातक स्तर के 75 बहुविकल्पी प्रश्न होते हैं।  इनमें से लगभग 60 प्रतिशत के प्रश्नों के सही उत्तर से ही रिजल्ट की उम्मीद की जा सकती है। फिर भी बहुत-से अभ्यर्थी और प्राध्यापक तरह-तरह के बहाने बनाकर और अपनी पी-एच.डी. की दुहाई देकर इससे छूट की वकालत करते हैं।

       देश में विद्वानो की कभी कमी नहीं रही है; परन्तु 2009 के यूजीसी नियम के पहले पी-एच. डी. कैसे होती थी, यह सभी जानते हैं। यहाँ तक कि जो लोग ठीक से 'पी-एच. डी.' भी नहीं लिख सकते हैं, वे भी डॉक्टर साहब बन गए। भाई आप डॉक्टर साहब हैं तो डॉक्टरी का प्रमाण तो दीजिए।

     क्या प्राध्यापक पद के उम्मीदवारों के लिए यह उचित नहीं होगा कि नेट परीक्षा से छूट के लिए बहाने बनाने के बजाए वे थोड़ी तैयारी करके नेट उत्तीर्ण कर लें ? इससे एक साथ तीन-तीन फायदे होंगे-
पहला तो वे स्वयं लाभान्वित होंगे। अपेक्षित ज्ञान तथा कौशल हासिल कर आत्मविश्वास से लबरेज होंगे जिससे शिक्षकों की योग्यताओं पर लोगों का विश्वास बना रहेगा।  दूसरा- शैक्षणिक जगत में एकरूपता आएगी और एक अनुकरणीय तथा सार्थक सन्देश जाएगा।  तीसरा- यूजीसी और सर्वोच्च न्यायालय जैसी शीर्ष एवं प्रतिष्ठित संवैधानिक संस्थाओं के आदेशों (मंशा) का भी सम्मान हो जाएगा।

उम्मीद की जा सकती है कि हमारे प्रबुद्ध अभ्यर्थी और महाविद्यालय/विश्वविद्यालय प्रबंधन, आदर्श स्थापित करने के अपने प्रयास में सफल होंगे।
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डॉ. राजा राम यादव
चलभाष-9911894311
ई-मेल- rainbowtc@gmail.com

Monday, 20 February 2017

कोई दीपक

एक दीपक लड़ रहा है,
अनवरत अंधियारों से।
लड़ रहा है कालिमा के,
क्रूरतम परिवारों से।

सूर्य की अगली किरण तक,
युद्ध यह चलता रहे।
इसलिए अनिवार्य है कि
'दीप' यह जलता रहे।

Monday, 21 November 2016

एक दीपक

एक दीपक जल रहा है,
दिक्-दिगंत प्रकाश को।
अपनी लौकिक शक्ति से,
सामूहिक विकास को।

सीमा हो सुरक्षित अपनी,
वचन पुख्ता चाहिए।
भीतरी गद्दारों से,
हिसाब चुकता चाहिए।

इसलिए हे हिन्दवासी!
स्नेह से सींचो इसे।
थोड़ा वक़्त और दो,
अति भार है दिया जिसे।

सादर-
डॉ. राजा राम यादव