Saturday, 24 November 2018

कल आज और कल

           कल आज और कल

      एक समय था जब गांधी जी किसी मार्ग-मकसद पर निकलते थे तो हजारों लोग साथ हो लेते थे। बिना कुछ सोचे। बिना कुछ समझे। बिना किसी तर्क-वितर्क के। निश्छल, निष्कपट, निःस्वार्थ, निरपेक्ष भाव से। आज कोई बड़ा से बड़ा नेता क्या स्वयं ब्रह्मा जी भी पृथ्वी पर आ जाएं तो पचास सवाल करेंगे लोग। इतनी इन्क्वायरी होगी कि वे भी कह बैठेंगे, ये कहां आ गए!

       तर्क करना ज़रूरी है। तर्क से नए तथ्यों का उद्घाटन होता है। परन्तु हरेक व्यक्ति के वितर्कों और कुतर्कों का उत्तर आप नहीं दे सकते। फिर आप अपनी बात कह ही नहीं पाएंगे। आप रास्ते में ही रह जाएंगे। लक्ष्य तक नहीं पहुंच पाएंगे। अगर आपको लक्ष्य तक पहुंचना है तो दृष्टि लक्ष्य पर गड़ाए रखिए। रास्ते में मिलने वाली सारी बाधाओं और समस्याओं का समाधान करने लगे तो आप स्वयं समस्याग्रस्त हो जाएंगे। फिर आप समाधान का हिस्सा नहीं रह पाएंगे। राह में पड़ने वाले सारे पशुओं को ढेले मारने लगे, सारे जानवरों से उलझने लगे तो आप मंजिल पर नहीं पहुंच पाएंगे। इसलिए रास्ते में मिलने वाले हर केकड़े को कंकर मारना आवश्यक नहीं है। बस बढ़ते जाइए। कहते हैं-

"अज्ञ: सुखमाराध्यः सुखतरमाराध्यते विशेषज्ञः।
ज्ञानलवदुर्विदग्धं ब्रह्मापि तं नरं न रञ्जयति।।"

      अर्थात मूर्खों को आसानी से समझाया जा सकता है। ज्ञानियों को और भी आसानी से समझाया जा सकता है। परंतु जो, है तो ज्ञानहीन पर खुद को सर्वज्ञ समझता है उसे ब्रह्मा भी नहीं समझा सकते हैं।

    इसलिए लक्ष्य पर सदैव अपनी नजरें टिकाए रहिए। मंजिल की ओर अग्रसर रहिए। कोई क्या बोलता है, उस पर ध्यान मत दीजिए। जब तक संघर्षरत रहेंगे तब तक आलोचना ही मिलेगी और जब सफल हो जाएंगे तो प्रशंसा। दोनों ही स्थिति में कुछ न कुछ मिलेगा ही : सफल हुए तो सफलता, असफल हुए तो सीख।

          "मंजिल मिले, मिले न मिले;
                 उसका ग़म नहीं;
   मंजिल की जुस्तजू में मेरे अरमां तो हैं।"

(जुस्तजू- खोज, तलाश, अन्वेषण
अरमां- आकांक्षा, लालसा, इच्छा, कामना)
- - -
डॉ. राजा राम यादव
21.11.2018

शांति बनाम शक्ति-प्रदर्शन!

शांति बनाम शक्ति-प्रदर्शन!

         सत्य और अहिंसा के पुजारी महात्मा गांधी शांति के प्रबल पक्षपोषक रहे हैं। आत्मा की शक्ति से समूचे संसार को विजित करने का माद्दा रखने वाले महात्मा बापू ने दुनिया को आत्मा की शक्ति से साक्षात्कार कराया। शांति की महत्ता को पुनर्स्थापित किया और संसार को आत्ममंथन के लिए आमंत्रित-प्रेरित किया।
           जय जवान, जय किसान का नारा बुलंद करने वाले धरती के लाल; लाल बहादुर शास्त्री जी ने शांति के लिए युद्ध की आवश्यकता को भी जायज ठहराया। आरोपित युद्ध के समुचित प्रतिकार की वकालत की। अशांति के अंत और शान्ति की स्थापना के लिए संघर्ष को सही करार दिया। क्योंकि शांति नायाब है। यह किसी भी कीमत पर मिले तो सस्ती ही है।

         शांति, इस छोटे से शब्द में संसार का सारा विभु, सारा ऐश्वर्य और सम्पूर्ण आनंद व्याप्त है। दुनिया के सारे नेक और सात्विक विचार शांति में पनपते हैं और शांति में ही फलीभूत होते हैं। शांति में सुख है। शांति में समृद्धि है। शांति में परमानंद है। शांति ही वह वस्तु है जिसके शोध और संधान में सारे ऋषि-मुनि, दार्शनिक-विचारक, साहित्यकार-राजनीतिज्ञ, सामाजिक और योद्धा युगों-युगों से लीन हैं। उन सबने यह अनुभव किया कि युद्ध से समस्याओं का समाधान नहीं होता है बल्कि समस्याएँ और भी बलवती होती है। सुलझने के वजाय और भी उलझती हैI दरअसल युद्ध ही सारी समस्याओं का असली कारण है इसलिए वे सारे तपोबल, योगबल और आत्मबल से पूरे मनोयोग के साथ शांति की तलाश में यत्र-तत्र-सर्वत्र भटकते रहे I

       शांति दो स्तरों पर अनुभूत होती है- व्यक्तिगत रूप से आत्मा के स्तर पर और सामूहिक रूप से समुदाय के स्तर पर। आज विश्व के इतने सारे देश जब परमाणु हथियारों से लैश हो चुके हैं तो शांति, विमर्श का विषय नहीं बल्कि आवश्यकता बन चुकी है। विभिन्न मतों-विचारों में विभक्त विश्व को स्नेह, प्रेम, सौहार्द और सद्भाव की आवश्यकता है। आत्म-मंडन की जगह आत्ममंथन ज़रूरी है। खाइयों को पाटने की आवश्यकता है। साधन-विहीनता और साधन-विपुलता के खड्डों को भरने की ज़रूरत है। अतिशय सुख और अतिशय दुख की अतिशयता को समाप्त कर सन्तुलन स्थापित करने की ज़रूरत है। 'दिनकर' कहते हैं-

"शांति नहीं तब तक,
जब तक सुख-भाग न नर का सम हो।
नहीं किसी को बहुत अधिक हो,
नहीं किसी को कम हो।"

           इस दुनिया का निर्माण प्रेम के आधार पर हुआ है, प्रेम के कारण ही पल रहा है और प्रेम पर ही इसका अस्तित्व टिका हुआ है। मस्तिष्क पर शासन सदा-सर्वदा के लिए नहीं किया जा सकता है। चिरस्थायी स्थान तो हृदय से ही बनाया जा सकता है। सर्वत्र प्रेम ही प्रेम आवश्यक है। नफरत के लिए यहां कोई स्थान नहीं है। 'कबीर' कहते हैं -
"ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय।" परन्तु- - - प्रेम पाने के लिए प्रेम अर्पण करना पड़ता है, कुछ कष्ट सहने पड़ते हैं, कुछ मूल्य चुकाने पड़ते हैं। इसलिए वे आगे कहते हैं-

"प्रेम न बाड़ी ऊपजै, प्रेम न हाट बिकाय।
राजा परजा जेहि रुचै, सीस देइ लै जाय।"

          आज विश्व जिस ग्लोबल विलेज की अवधारणा को साकार करने की दिशा में प्रयासरत है वस्तुतः यह भारत की ही पौराणिक परंपरा है। हम 'वसुधैव कुटुंबकम' के पक्षपोषक और विश्वशांति के अग्रणी ध्वजवाहक रहे हैं। भारतीय संस्कृति मानव धर्म की जय, अधर्म के नाश, प्राणियों में सद्भावना और विश्व के कल्याण की कामना करने वाली संस्कृति का नाम है। विश्व के सभी देश इस विराट अवधारणा को अब स्वीकार करते हैं।

         विज्ञान की प्रगति ने आज पूरे विश्व को एकाकार कर दिया है। रही-सही कसर इंटरनेट ने पूरी कर दी है। फोन और इंटरनेट के माध्यम से संपूर्ण विश्व से सेकेंडों में जुड़ा जा सकता है और अपनी बातें पहुँचाई जा सकती है। संचार के इन तीव्र माध्यमों का प्रयोग कर प्रेम, सहिष्णुता और सौहार्द की त्रिवेणी प्रवाहित करने की जरूरत है।

             आइए, अमन-चैन का रास्ता अपनाएं। समस्त जीव-जगत के कल्याण का मार्ग प्रशस्त करें। एक-दूसरे की स्वतंत्रता का सम्मान करें। अपने अधिकारों को उससे पहले नियंत्रित कर लें जहां से दूसरों के अधिकारों की शुरुआत होती है। अपने कर्तव्यों को इस कदर व्यापक कर लें कि हरेक का कष्ट अपना कष्ट प्रतीत होने लगे। अपनी सोच को इतना विकसित कर लें कि सहानुभूति की जगह समानुभूति उत्पन्न हो जाए - - - ताकि - - -

''प्राणियों में सद्भावना हो,
विश्व का कल्याण हो।।''
- - -
डॉ. राजा राम यादव
02.10.2018
(गांधी-शास्त्री जयंती)
मोब-9911894311

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Friday, 23 November 2018

विजयदशमी : पुरुषार्थ की विजय।

विजयदशमी : पुरुषार्थ की विजय।

💐मंगल कामनाएं💐

    देवी जागरण में गया था। महाअष्टमी के अवसर पर। बहुत सारे गीत गाए मैंने। लोग आनन्द में सराबोर थे। क्या महिला क्या पुरुष! सभी झूम-झूम के, नाच-नाच के, बेसुध थे। फिर शुरू किया "मैं तो आरती उतारूँ रे, संतोषी माता की।" माहिलाएँ गरबा-डांडिया के आनन्दसागर में निमग्न हो गईं। भक्ति, उमंग और संगीत की त्रिवेणी प्रवाहित हो चली। मैं भी आकंठ संपृक्त हो उठा। लोग कहते हैं, अच्छा गाता हूँ। अच्छा क्या? कोई ख़ास नहीं। बस, दिल से गाता हूँ। उन्हें अच्छा लगता है, ये उनकी अच्छाई है।

      एक गीत था "माता रानी फल देगी, आज नहीं तो कल देगी।" सोचा, पूरे देश में यही बयार बहनी चाहिए। आशा की डोर से बंधे रहेंगे। रामदरश मिश्र जी की पंक्तियां अनायास याद आ गईं-
"किसी को गिराया न खुद को उछाला,
कटा जिंदगी का सफर धीरे-धीरे।
जहां आप पहुंचे छलांगें लगाकर,
वहां मैं भी पहुंचा मगर धीरे-धीरे।।"

         मिश्र जी से ही क्यों, पहले से भी जानते हैं- "कारज धीरे होत हैं, काहे होत अधीर. . . . . ।"

         फिर हम झोलियां क्यों फैलाते हैं भगवान के आगे? क्यों नहीं तरुवर के फलने तक इसे सींचते रहने का धैर्य धारण करते हैं? हम भक्ति, श्रद्धा और आनन्द की वैतरणी में स्नान करने आए हैं। सौदा करने तो नहीं आए हैं न? भगवान, तुम मेरा ये काम कर दो तो मैं जगराता करवाउंगी। मेरा ये करा दो- - - तो मैं सवा सेर प्रसाद चढ़ाऊंगी। - - - जोड़ा नारियल चढ़ाऊंगी - - - । क्यों? ये व्यापार क्यों? याचना क्यों? अरे, जिस चीज की कमी है या जिसकी मुझे दरकार है, अपने पुरुषार्थ से उसे हासिल करूँगा। भीख क्यों माँगूंगा!

   अपनी योग्यताओं का विकास कीजिए। सद्बुध्दि मांगिए। सद्विचार मांगिए। पुरुषार्थ प्रदर्शन के लिए अवसर मांगिए। ऐसा क्यों नहीं कहते - प्रभु! जीवन का यह युद्ध मेरा है। सो युद्ध तो मैं ही लड़ूंगा पर तुम मेरा सारथी बनकर सदैव मार्गदर्शन करते रहना ताकि मैं भटक न जाऊं। तीर तो मैं ही चलाऊंगा, तुम बस मेरे तीर को सही निशाने तक पहुंचा देना।

      शिवलिंग पर जलाभिषेक कीजिए। श्रीराम को पुष्प अर्पित कीजिए। कृष्ण को नैवेद्य चढ़ाइए। यह श्रद्धा है। भक्ति है। आपको सम्बल मिलेगा। पर, वहां से प्रेरणा लीजिए। सशक्त होंगे आप। सामर्थ्यवान बनेंगे आप। अपने पुरुषार्थ का प्रदर्शन कीजिए। सफल होंगे आप। शिवलिंग पर अपना सर पटक-पटक कर अपने प्राण गँवा देंगे, तो भी सफलता नहीं मिलेगी। रावण दहन की नौटंकी में इतने बेख़बर मत बन जाइए कि खुद ही ख़बर बन जाइए।*

         इसलिए, गाय-गाय; गाय-गाय का जाप करना बंद कीजिए। गाय को दुहिये। उस दूध को पीजिए। कुश्ती कीजिए। तब अगर भाग्य और भगवान ने चाहा तो आप पहलवान बन जाएंगे। राम-राम, राम-राम का सिर्फ जाप मत कीजिए। राम को समझिए। उनका सच्चरित्र अपने जीवन में उतारिए। फिर मर्यादापुरुषोत्तम श्री राम ने चाहा तो आप रामत्व को प्राप्त कर सकेंगे।
"दशरथ सुत तिहुँ लोक बखाना,
राम नाम का मरम है जाना??"

     कृष्ण को समझने का प्रयत्न कीजिए। उनकी सीख को अपने जीवन में उतारिए। फिर यदुकुलनायक अहीर-सम्राट ने कृपा की तो आप कृष्णत्व को प्राप्त कर सकेंगे। पूरी गीता के सभी 18 अध्यायों में कर्मवाद के सिद्धांत को ही प्रतिपादित किया है यादव-शिरोमणि श्री कृष्ण ने।
"कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन. . . . ."

        कर्मवीरों को वह सब कुछ मिला है जो उसे चाहिए। जिसकी उसे दरकार है। और जिसके लिए वह सर्वथा उपयुक्त, सर्वथा योग्य है। वह पृथ्वी के समस्त सुखों को भोगता है। समाज के लिए मिसाल कायम करता है। आने वाली पीढ़ी के लिए प्रेरणा स्रोत सिद्ध होता है। भाग्यवादी को केवल वही मिल पाता है जिसे कर्मवादियों ने छोड़ दिया है। जूठन खाने वाला मत बनिए। कर्मवीर बनिए। दयावीर बनिए। दानवीर बनिए। युद्धवीर बनिए।

      सतयुग में युद्ध देवों और असुरों में था। दोनों अलग-अलग लोकों के थे। देवलोक और असुरलोक के। त्रेता में युद्धस्थल थोड़ा निकट आया। एक ही लोक - पृथ्वीलोक के, बस दो अलग-अलग राज्य। अवधपति और लंकापति का युद्ध। युद्धस्थल बना समुंदर पार। द्वापर में युद्धस्थल और निकट आ गया। एक ही परिवार के भाई! आपस में लड़ खपे। युद्धस्थल बना उन्हीं के ही राज्य का एक क्षेत्र - कुरुक्षेत्र! अब, कलियुग चल रहा है। युद्धक्षेत्र और निकटतर आ गया है- अपना ही आत्मस्थल! अपना ही चित्त, युद्धस्थल बना हुआ है। अपने भीतर की विकृतियों को मिटाइए।

         जागरण में ज़रूर जाइए। अपने अंदर के राम का "जागरण" कीजिए और रावण का दमन कीजिए। कृष्ण का उद्बोधन कीजिए और कंस का शमन कीजिए। अपने पौरुष को जागृत कीजिए। आलस्य और अकर्मण्यता का त्याग कीजिए। अपनी समस्त संकीर्णताओं को समाप्त कीजिए। ईर्ष्या, द्वेष, स्वार्थ, लोभ, मोह, अहंकार रूपी दानवों से जितना ऊंचा उठ सकेंगे देवत्व के उतने ही करीब पहुंच सकेंगे। और हां, अगर हो सके तो अगली बार अपने स्कूलों को भी पंडालों की तरह सजाइए!!

    आज के "राजा राम" को बीते कल के "राजा राम" से बेहतर बनाइए। साथ ही प्रयास यह रहे कि आने वाले कल का "राजा राम" आज वाले "राजा राम" से भी श्रेष्ठतर हो। सतयुग के "राजा" (सत्य श्री हरिश्चंद्र) सीधे-सादे, भोले रहे होंगे। एक ही गुण, सत्यगुण-सम्पन्न। शायद इसीलिए अपना सारा राजपाट गंवा बैठे। पत्नी (रानी सेव्या) और पुत्र (रोहित) को भी खो दिए। कोई नहीं पूजता है उन्हें। याद भी नहीं करता है कोई।

         त्रेता के राजा "राम" (श्री राम) 12 गुणों के स्वामी हुए। बिना अपनी राजशाही सेना के, शत्रुओं का संहार कर अपनी प्रतिष्ठा-पत्नी (सीता) को वापस प्राप्त किए। अपने राज्य की सीमाओं को सुरक्षित किए। अश्वमेध किए। असफल रहे। फिर भी पूजित हुए। वन्दनीय हुए। पर अनुकरणीय नहीं बन पाए। प्रेरणादायक नहीं बन पाए।

   द्वापर के राजा "यादवराज" (श्री कृष्ण) यदुकुलभूषण देवकीनंदन 16 गुणों के आगार हुए। सभी कलाओं में निपुण। कुछ नहीं खोया। कुछ था ही नहीं खोने को। जेल में जन्म हुआ। कौन-सा कष्ट नहीं सहा! कौन-सी यातना नहीं झेली! संघर्षपूर्ण शैशव। अभावग्रस्त बचपन। कष्टप्रद कैशोर्य। यौवन और प्रौढ़ावस्था युद्धस्थल में स्वाहा। पर कभी उफ्फ तक नहीं किया। योगीराज कहलाए। पूजित हुए। कूजित हुए। वंदनीय हुए। नमनीय हुए। अनुकरणीय हुए।

     किसे इतनी अग्निपरीक्षाओं से गुजरना पड़ा होगा? आततायियों का सर्वनाश कर दिया। एक-एक को चुन-चुन के यमलोक का रास्ता दिखाया। नवीन समाज की स्थापना की। शस्त्र को हाथ नहीं लगाया। और युद्ध के बीच मैदान में, डंके की चोट पर घोषणा की - पार्थ!! मैं ही ईश्वर हूँ! मेरी शरण में आओ! मोक्ष दूंगा!
"सर्वधर्मान्परित्यज्य,
मामेकं शरणम ब्रज।
अहम त्वाम सर्वपापेभ्यो
मोक्षयिष्यामि मा शुचः।।"  
     
       इतने कष्टों के बाद निखरकर कोई, भगवान से कम बन भी क्या सकता है? सोना भी तो अधिक तपने पर कुंदन बन जाता है।

     जज का काम जज को करने दीजिए। वह अपना कार्य कुशलतापूर्वक कर सके इसलिए पुलिस और वकील को अपना-अपना काम करना पड़ेगा। तभी शांति और सुव्यवस्था बनी रहेगी और विजयदशमी मंगलमयी हो सकेगी। क्या आपको भी अपना काम दुबारा याद दिलाना पड़ेगा!!
शुभकामनाएं💐
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डॉ. राजा राम यादव
19.10.2018
विजयदशमी

*  दशहरे वाले दिन अमृतसर में आतिशबाजी की वजह से लोग ट्रेन की आवाज नहीं सुन सके और पटरी पर खड़े होकर तमाशा देखने वाले कई लोगों की जानें चली गईं। ईश्वर इनके परिवार को इस घोर पीड़ा से उबरने का संबल प्रदान करे और मृतकों की आत्मा को शांति मिले। विनम्र श्रद्धांजलि!💐

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पार्टी एन्जॉय करें - प्लेट जाया न करें!

पार्टी एन्जॉय करें - प्लेट जाया न करें!

         शादी, पार्टी आदि में प्रायः बुफ़े की व्यवस्था होती है जिसमें मेज़बान को प्लेट की गिनती के हिसाब से पेमेंट करना पड़ता है। परंतु हम कभी इस पर विचार नहीं करते हैं! अक्सर हम एक से अधिक प्लेट में खाना खाते हैं। कुछ लोग तो तीन-तीन, चार-चार प्लेट भी यूज कर लेते हैं। आप खाना तो उतना ही खा रहे हैं मगर बेचारे मेज़बान को 1 व्यक्ति के लिए 2-3 लोगों का पेमेंट देना पड़ता है। क्या यह मेज़बान के साथ ज्यादती और अन्याय नहीं है?

          यदि आप किसी होटल में खाना खाते हैं और आपसे उतने ही खाने का 3 गुना पैसा मांगा जाए तो आपको कैसा लगेगा? पार्टी में मेज़बान को उतने ही खाना के लिए 3 गुना या 4 गुना पेमेन्ट के लिए क्यों मज़बूर करते हैं? विचार कीजिए! आप जागरूक रहें और महिलाओं व अपने बच्चों को भी इसके लिए जागरूक करें कि वे एक-एक ही प्लेट का इस्तेमाल करें।

        एक व्यक्ति एक ही प्लेट में तो खा ही सकता है। एक आइटम खाकर, प्लेट फेंक कर दूसरी प्लेट निकालने की हमारी आदत बेचारे मेज़बान को कितनी महंगी पड़ती है, यह हम कभी सोचने की ज़रूरत ही नहीं समझते हैं! और, बेचारा मेज़बान किसी को कुछ नहीं कहता। वह चुपचाप हमारी लापरवाही का एकस्ट्रा पेमेंट कर देता है। वह हम सबके सामने हाथ जोड़कर खड़ा रहता है और विनती करता है कि हम पार्टी का आनंद लें। लेकिन हम कैसा आनंद लेते हैं! थोड़ी-सी लापरवाही के कारण हम उसको कई गुना ज़्यादा पेमेन्ट करने के लिए मज़बूर कर देते हैं।

        अतः हम पार्टी का भरपूर आनंद लें। भरपेट खाना खाएं। मगर थोड़ी-सी समझदारी दिखाते हुए मेज़बान का सहयोग करें। ध्यान रहे, गिनती सबसे बड़ी वाली प्लेट यानि डाइनिंग प्लेट की होती है जिसमें रोटी, चावल, सब्जी, पापड़, पुलाव इत्यादि खाते हैं। छोटी वाली टी-प्लेट, दोना-पत्तल या डिस्पोजेबल की गिनती नहीं होती है। यानी आप इन डिस्पोज़ेबल या छोटी वाली प्लेटों में स्टार्टर, स्वीट-डिश और आइसक्रीम आदि कितनी भी बार ले सकते हैं। इससे मेजबान के बजट पर कोई असर नहीं पड़ेगा। आशा है आप इस संदेश का असली मकसद ज़रूर समझ गए होंगे और पार्टी-भोज आदि में एक से अधिक डाइनिंग प्लेट (सबसे बड़ी वाली प्लेट) का इस्तेमाल नहीं करेंगे साथ ही दूसरों को भी इसके लिए प्रेरित करेंगे।

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डॉ. राजा राम यादव
21.11.2018

Friday, 17 August 2018

क्या सच में हम स्वतंत्र हो गए हैं !!


क्या सच में हम स्वतंत्र हो गए हैं!!

     वस्तुतः स्वतंत्रता दो स्तरों पर अनुभूत होती है। वैयक्तिक रूप से आत्मा के स्तर पर और सामूहिक रुप से समुदाय के स्तर पर। जहां एक तरफ दैहिक, धार्मिक और आर्थिक स्वतंत्रता हमें व्यक्तिगत रूप से प्रभावित करती हैं वहीं सामाजिक और राजनैतिक स्वतंत्रता समूह के स्तर पर हमारे सामुदायिक जीवन पर प्रभाव डालती है। स्वतंत्रता अर्थात आज़ादी; इस छोटे-से शब्द में संसार का सारा विभु और समस्त ऐश्वर्य व्याप्त है। आज़ादी किसी भी कीमत पर मिले, सस्ती ही है।

      क्या अशिक्षा से निजात मिल गई, क्या विद्यालयों-महाविद्यालयों में अपने मनपसंद और रोजगारपरक विषय चुनने की आज़ादी मिल गई, क्या जनसंख्या के बढ़ते बोझ से आज़ादी मिल गई, क्या गरीबों को, आए दिन और गरीब होने की अधोगामी गति से मुक्ति मिल गई, क्या जनता को विदेशी मानसिकता से युक्त प्रशासन-प्रणाली से आज़ादी मिल गई, क्या एक राष्ट्र - एक राष्ट्रभाषा का सपना साकार हो पाया, क्या आम जन की भाषा, राष्ट्र की भाषा बन सकी, क्या जनता में उसके स्वयं को शासक होने का भाव जागृत हो सका, क्या तिरंगे में लिपटी सपूतों की लाशें आने का सिलसिला थम गया आदि ऐसे सवाल हैं जो अभी भी मुँह बाए खड़े हैं। इन सवालों के जवाब तलाशे बिना आज़ादी की सार्थकता सिद्ध नहीं हो सकती।

     परन्तु हाँ, आज़ादी तो मिली है- खुले आम नियमों और कायदे-कानूनों की धज्जियां उड़ाने की, सरकारी नीतियों का अनुसरण करने के बजाय उसकी जमकर आलोचना करने की, अभिव्यक्ति की आज़ादी के नाम पर देश के टुकड़े करने वाले नारे लगाने की, सरकारी प्रतिष्ठानों और इमारतों की संरक्षा के बजाय इसे नुकसान पहुंचाने की, सरकारी ज़मीनों पर अनाधिकृत कब्जा जमाने की, सड़क पर कूड़ा और सर्वत्र गन्दगी फैलाने की, मौका मिलते ही अपनी जेबें भरने की, सत्तालोलुपता की अपनी छटपटाहट को सरेआम जाहिर करने की, जात-बिरादरी और मजहब के नाम पर नफरत फैलाने की, अपनी अक्षमताओं और अकर्मण्यता का ठीकरा व्यवस्था और सरकार के माथे फोड़ने की। क्या सही मायने में यही आज़ादी है!

     इसलिए आइए, विचार करें कि हम स्वयं को किस अनुरूप ढाल पाए हैं! क्या स्वतंत्रता की हिफाजत के लिए हम अपना योगदान कर पाए हैं! क्या आज़ादी की असली कीमत का भान हमें हो पाया है और इसे अक्षुण्ण रखने के लिए हम अपने हिस्से का भाग अर्पित कर सके हैं! सतत स्मरण रहे-

"ऊंची हुई मशाल हमारी, आगे कठिन डगर है।
शत्रु हट गया लेकिन, उसकी छायाओं का डर है।
जन गंगा में ज्वार, लहर तुम प्रवहमान रहना ,
पहरुए सावधान रहना। पहरुए सावधान रहना।"
--
डॉ. राजा राम यादव
15.8.2018

Thursday, 25 January 2018

फ़िल्म पद्मावत - एक  बेबुनियाद विरोध

फ़िल्म पद्मावत - एक  बेबुनियाद विरोध

      इतिहासकार, फ़िल्म समीक्षक और न्यूज़ नेशन की टीम के साथ फ़िल्म पद्मावत की स्क्रीनिंग में शरीक होने का अवसर मिला। जो कुछ भी नकारात्मक बातें इस फ़िल्म के संबंध में मैंने अपने कानों से सुन रखी थी; अपनी आंखों से देखने के बाद वे सारी बातें निर्मूल, निराधार और कोरी कल्पना साबित हुई। इस फ़िल्म में ऐसा कुछ भी नहीं है जिससे राजपूती शान में किसी तरह का कोई बट्टा लगे। मैं तो कहूंगा कि यह फ़िल्म राजपूतों की ही नहीं बल्कि हिन्दू समाज की शौर्य गाथा का और अधिक ऊंचे स्वर में गायन है। 

          इस फ़िल्म में राजपूत क्षत्राणी तीरंदाजी करती दिखाई गई हैं। उन्हें विदुषी, युद्ध कला में निपुण, राजनीति में निष्णात, कूटनीति में दक्ष और अपनी आन-बान और शान की खातिर सम्पूर्ण बलिदान देने को तत्पर वीरांगना के रूप में दिखाया गया है। राजपूत समाज अपने शौर्य और पराक्रम के लिए सदैव प्रसिद्ध रहा है। वे शत्रु के भी आत्मीय निमंत्रण पर निहत्थे होकर जाते हैं। वे अपने जीवन-मूल्य की रक्षा के लिए अपना सर्वस्व समर्पित करने को तैयार हैं।

      इस फ़िल्म को देखकर आपके अंदर इतिहास को समझने की ललक पैदा होगी और सत्य का अनुसंधान करने की दृष्टि विकसित होगी जिससे न केवल आप अपने गौरवशाली इतिहास की ओर आकृष्ट होंगें बल्कि अपनी प्राचीन भूलों को सुधारकर नवीन जीवन मूल्य स्थापित कर सकेंगे।

        एकबार अवश्य देखिए। बिना देखे टिप्पणी मत कीजिए; विरोध तो बहुत दूर की बात है।
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डॉ. राजा राम यादव
मोब. - 9911894311
23.01.2018

Monday, 20 March 2017

क्या कहें ? क्या न कहें !

क्या कहें ? क्या न कहें !
      वस्तुतः साहित्य जनसमूह के हृदय का विस्तार है। इसलिए आवश्यक है कि यह सकारात्मक और सार्थक हो। कुछ भी कहने से पहले सोचना जरूरी है। क्या कहना है?’ से अधिक आवश्यक यह जानना है कि क्या नहीं कहना है?’ क्या लिखना है से अधिक जरूरी है कि क्या नहीं लिखा जाए। उपयुक्त विषय पर सारगर्भित, तथ्यपरक और ज्ञानवर्धक लेख, कविता, कहानी, रिपोर्ताज आदि मनोरंजन के अतिरिक्त साहित्यिक समझ को विकसित करने मे भी अहम भूमिका निभाते हैं।      
      साहित्य की सार्थकता इस बात पर निर्भर है कि यह मनोरंजन के अतिरिक्त सामाजिक का कितना मार्गदर्शन करता है। इसमें अतीत, वर्तमान और भविष्य तीनों को एक साथ झंकृत करने का कितना सामर्थ्य है। वास्तव में साहित्य वही है जिसमें यथार्थ और आदर्श के सामंजस्य का प्रयत्न हो, सत्य और सत्य के भेद का प्रकटीकरण हो और कथ्य-कथ्य के ज्ञान का आग्रह हो। अतः आवश्यक है कि बोलने से पहले दो बार सोचा जाए औऱ लिखने से पहले 3 बार सोचा जाए क्योंकि हृदय की बात लिखित रूप में आने के पश्चात सहस्त्र हृदयों तक पहुँच जाती है। इसलिए संत कबीर कहते हैं -
बोली एक अनमोल है, जो कोई बोलै जानि,
हिये तराजू तौलि के, तब मुख बाहर आनि।

डॉ. राजा राम यादव