Saturday, 24 November 2018

शांति बनाम शक्ति-प्रदर्शन!

शांति बनाम शक्ति-प्रदर्शन!

         सत्य और अहिंसा के पुजारी महात्मा गांधी शांति के प्रबल पक्षपोषक रहे हैं। आत्मा की शक्ति से समूचे संसार को विजित करने का माद्दा रखने वाले महात्मा बापू ने दुनिया को आत्मा की शक्ति से साक्षात्कार कराया। शांति की महत्ता को पुनर्स्थापित किया और संसार को आत्ममंथन के लिए आमंत्रित-प्रेरित किया।
           जय जवान, जय किसान का नारा बुलंद करने वाले धरती के लाल; लाल बहादुर शास्त्री जी ने शांति के लिए युद्ध की आवश्यकता को भी जायज ठहराया। आरोपित युद्ध के समुचित प्रतिकार की वकालत की। अशांति के अंत और शान्ति की स्थापना के लिए संघर्ष को सही करार दिया। क्योंकि शांति नायाब है। यह किसी भी कीमत पर मिले तो सस्ती ही है।

         शांति, इस छोटे से शब्द में संसार का सारा विभु, सारा ऐश्वर्य और सम्पूर्ण आनंद व्याप्त है। दुनिया के सारे नेक और सात्विक विचार शांति में पनपते हैं और शांति में ही फलीभूत होते हैं। शांति में सुख है। शांति में समृद्धि है। शांति में परमानंद है। शांति ही वह वस्तु है जिसके शोध और संधान में सारे ऋषि-मुनि, दार्शनिक-विचारक, साहित्यकार-राजनीतिज्ञ, सामाजिक और योद्धा युगों-युगों से लीन हैं। उन सबने यह अनुभव किया कि युद्ध से समस्याओं का समाधान नहीं होता है बल्कि समस्याएँ और भी बलवती होती है। सुलझने के वजाय और भी उलझती हैI दरअसल युद्ध ही सारी समस्याओं का असली कारण है इसलिए वे सारे तपोबल, योगबल और आत्मबल से पूरे मनोयोग के साथ शांति की तलाश में यत्र-तत्र-सर्वत्र भटकते रहे I

       शांति दो स्तरों पर अनुभूत होती है- व्यक्तिगत रूप से आत्मा के स्तर पर और सामूहिक रूप से समुदाय के स्तर पर। आज विश्व के इतने सारे देश जब परमाणु हथियारों से लैश हो चुके हैं तो शांति, विमर्श का विषय नहीं बल्कि आवश्यकता बन चुकी है। विभिन्न मतों-विचारों में विभक्त विश्व को स्नेह, प्रेम, सौहार्द और सद्भाव की आवश्यकता है। आत्म-मंडन की जगह आत्ममंथन ज़रूरी है। खाइयों को पाटने की आवश्यकता है। साधन-विहीनता और साधन-विपुलता के खड्डों को भरने की ज़रूरत है। अतिशय सुख और अतिशय दुख की अतिशयता को समाप्त कर सन्तुलन स्थापित करने की ज़रूरत है। 'दिनकर' कहते हैं-

"शांति नहीं तब तक,
जब तक सुख-भाग न नर का सम हो।
नहीं किसी को बहुत अधिक हो,
नहीं किसी को कम हो।"

           इस दुनिया का निर्माण प्रेम के आधार पर हुआ है, प्रेम के कारण ही पल रहा है और प्रेम पर ही इसका अस्तित्व टिका हुआ है। मस्तिष्क पर शासन सदा-सर्वदा के लिए नहीं किया जा सकता है। चिरस्थायी स्थान तो हृदय से ही बनाया जा सकता है। सर्वत्र प्रेम ही प्रेम आवश्यक है। नफरत के लिए यहां कोई स्थान नहीं है। 'कबीर' कहते हैं -
"ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय।" परन्तु- - - प्रेम पाने के लिए प्रेम अर्पण करना पड़ता है, कुछ कष्ट सहने पड़ते हैं, कुछ मूल्य चुकाने पड़ते हैं। इसलिए वे आगे कहते हैं-

"प्रेम न बाड़ी ऊपजै, प्रेम न हाट बिकाय।
राजा परजा जेहि रुचै, सीस देइ लै जाय।"

          आज विश्व जिस ग्लोबल विलेज की अवधारणा को साकार करने की दिशा में प्रयासरत है वस्तुतः यह भारत की ही पौराणिक परंपरा है। हम 'वसुधैव कुटुंबकम' के पक्षपोषक और विश्वशांति के अग्रणी ध्वजवाहक रहे हैं। भारतीय संस्कृति मानव धर्म की जय, अधर्म के नाश, प्राणियों में सद्भावना और विश्व के कल्याण की कामना करने वाली संस्कृति का नाम है। विश्व के सभी देश इस विराट अवधारणा को अब स्वीकार करते हैं।

         विज्ञान की प्रगति ने आज पूरे विश्व को एकाकार कर दिया है। रही-सही कसर इंटरनेट ने पूरी कर दी है। फोन और इंटरनेट के माध्यम से संपूर्ण विश्व से सेकेंडों में जुड़ा जा सकता है और अपनी बातें पहुँचाई जा सकती है। संचार के इन तीव्र माध्यमों का प्रयोग कर प्रेम, सहिष्णुता और सौहार्द की त्रिवेणी प्रवाहित करने की जरूरत है।

             आइए, अमन-चैन का रास्ता अपनाएं। समस्त जीव-जगत के कल्याण का मार्ग प्रशस्त करें। एक-दूसरे की स्वतंत्रता का सम्मान करें। अपने अधिकारों को उससे पहले नियंत्रित कर लें जहां से दूसरों के अधिकारों की शुरुआत होती है। अपने कर्तव्यों को इस कदर व्यापक कर लें कि हरेक का कष्ट अपना कष्ट प्रतीत होने लगे। अपनी सोच को इतना विकसित कर लें कि सहानुभूति की जगह समानुभूति उत्पन्न हो जाए - - - ताकि - - -

''प्राणियों में सद्भावना हो,
विश्व का कल्याण हो।।''
- - -
डॉ. राजा राम यादव
02.10.2018
(गांधी-शास्त्री जयंती)
मोब-9911894311

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