Friday, 23 November 2018

विजयदशमी : पुरुषार्थ की विजय।

विजयदशमी : पुरुषार्थ की विजय।

💐मंगल कामनाएं💐

    देवी जागरण में गया था। महाअष्टमी के अवसर पर। बहुत सारे गीत गाए मैंने। लोग आनन्द में सराबोर थे। क्या महिला क्या पुरुष! सभी झूम-झूम के, नाच-नाच के, बेसुध थे। फिर शुरू किया "मैं तो आरती उतारूँ रे, संतोषी माता की।" माहिलाएँ गरबा-डांडिया के आनन्दसागर में निमग्न हो गईं। भक्ति, उमंग और संगीत की त्रिवेणी प्रवाहित हो चली। मैं भी आकंठ संपृक्त हो उठा। लोग कहते हैं, अच्छा गाता हूँ। अच्छा क्या? कोई ख़ास नहीं। बस, दिल से गाता हूँ। उन्हें अच्छा लगता है, ये उनकी अच्छाई है।

      एक गीत था "माता रानी फल देगी, आज नहीं तो कल देगी।" सोचा, पूरे देश में यही बयार बहनी चाहिए। आशा की डोर से बंधे रहेंगे। रामदरश मिश्र जी की पंक्तियां अनायास याद आ गईं-
"किसी को गिराया न खुद को उछाला,
कटा जिंदगी का सफर धीरे-धीरे।
जहां आप पहुंचे छलांगें लगाकर,
वहां मैं भी पहुंचा मगर धीरे-धीरे।।"

         मिश्र जी से ही क्यों, पहले से भी जानते हैं- "कारज धीरे होत हैं, काहे होत अधीर. . . . . ।"

         फिर हम झोलियां क्यों फैलाते हैं भगवान के आगे? क्यों नहीं तरुवर के फलने तक इसे सींचते रहने का धैर्य धारण करते हैं? हम भक्ति, श्रद्धा और आनन्द की वैतरणी में स्नान करने आए हैं। सौदा करने तो नहीं आए हैं न? भगवान, तुम मेरा ये काम कर दो तो मैं जगराता करवाउंगी। मेरा ये करा दो- - - तो मैं सवा सेर प्रसाद चढ़ाऊंगी। - - - जोड़ा नारियल चढ़ाऊंगी - - - । क्यों? ये व्यापार क्यों? याचना क्यों? अरे, जिस चीज की कमी है या जिसकी मुझे दरकार है, अपने पुरुषार्थ से उसे हासिल करूँगा। भीख क्यों माँगूंगा!

   अपनी योग्यताओं का विकास कीजिए। सद्बुध्दि मांगिए। सद्विचार मांगिए। पुरुषार्थ प्रदर्शन के लिए अवसर मांगिए। ऐसा क्यों नहीं कहते - प्रभु! जीवन का यह युद्ध मेरा है। सो युद्ध तो मैं ही लड़ूंगा पर तुम मेरा सारथी बनकर सदैव मार्गदर्शन करते रहना ताकि मैं भटक न जाऊं। तीर तो मैं ही चलाऊंगा, तुम बस मेरे तीर को सही निशाने तक पहुंचा देना।

      शिवलिंग पर जलाभिषेक कीजिए। श्रीराम को पुष्प अर्पित कीजिए। कृष्ण को नैवेद्य चढ़ाइए। यह श्रद्धा है। भक्ति है। आपको सम्बल मिलेगा। पर, वहां से प्रेरणा लीजिए। सशक्त होंगे आप। सामर्थ्यवान बनेंगे आप। अपने पुरुषार्थ का प्रदर्शन कीजिए। सफल होंगे आप। शिवलिंग पर अपना सर पटक-पटक कर अपने प्राण गँवा देंगे, तो भी सफलता नहीं मिलेगी। रावण दहन की नौटंकी में इतने बेख़बर मत बन जाइए कि खुद ही ख़बर बन जाइए।*

         इसलिए, गाय-गाय; गाय-गाय का जाप करना बंद कीजिए। गाय को दुहिये। उस दूध को पीजिए। कुश्ती कीजिए। तब अगर भाग्य और भगवान ने चाहा तो आप पहलवान बन जाएंगे। राम-राम, राम-राम का सिर्फ जाप मत कीजिए। राम को समझिए। उनका सच्चरित्र अपने जीवन में उतारिए। फिर मर्यादापुरुषोत्तम श्री राम ने चाहा तो आप रामत्व को प्राप्त कर सकेंगे।
"दशरथ सुत तिहुँ लोक बखाना,
राम नाम का मरम है जाना??"

     कृष्ण को समझने का प्रयत्न कीजिए। उनकी सीख को अपने जीवन में उतारिए। फिर यदुकुलनायक अहीर-सम्राट ने कृपा की तो आप कृष्णत्व को प्राप्त कर सकेंगे। पूरी गीता के सभी 18 अध्यायों में कर्मवाद के सिद्धांत को ही प्रतिपादित किया है यादव-शिरोमणि श्री कृष्ण ने।
"कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन. . . . ."

        कर्मवीरों को वह सब कुछ मिला है जो उसे चाहिए। जिसकी उसे दरकार है। और जिसके लिए वह सर्वथा उपयुक्त, सर्वथा योग्य है। वह पृथ्वी के समस्त सुखों को भोगता है। समाज के लिए मिसाल कायम करता है। आने वाली पीढ़ी के लिए प्रेरणा स्रोत सिद्ध होता है। भाग्यवादी को केवल वही मिल पाता है जिसे कर्मवादियों ने छोड़ दिया है। जूठन खाने वाला मत बनिए। कर्मवीर बनिए। दयावीर बनिए। दानवीर बनिए। युद्धवीर बनिए।

      सतयुग में युद्ध देवों और असुरों में था। दोनों अलग-अलग लोकों के थे। देवलोक और असुरलोक के। त्रेता में युद्धस्थल थोड़ा निकट आया। एक ही लोक - पृथ्वीलोक के, बस दो अलग-अलग राज्य। अवधपति और लंकापति का युद्ध। युद्धस्थल बना समुंदर पार। द्वापर में युद्धस्थल और निकट आ गया। एक ही परिवार के भाई! आपस में लड़ खपे। युद्धस्थल बना उन्हीं के ही राज्य का एक क्षेत्र - कुरुक्षेत्र! अब, कलियुग चल रहा है। युद्धक्षेत्र और निकटतर आ गया है- अपना ही आत्मस्थल! अपना ही चित्त, युद्धस्थल बना हुआ है। अपने भीतर की विकृतियों को मिटाइए।

         जागरण में ज़रूर जाइए। अपने अंदर के राम का "जागरण" कीजिए और रावण का दमन कीजिए। कृष्ण का उद्बोधन कीजिए और कंस का शमन कीजिए। अपने पौरुष को जागृत कीजिए। आलस्य और अकर्मण्यता का त्याग कीजिए। अपनी समस्त संकीर्णताओं को समाप्त कीजिए। ईर्ष्या, द्वेष, स्वार्थ, लोभ, मोह, अहंकार रूपी दानवों से जितना ऊंचा उठ सकेंगे देवत्व के उतने ही करीब पहुंच सकेंगे। और हां, अगर हो सके तो अगली बार अपने स्कूलों को भी पंडालों की तरह सजाइए!!

    आज के "राजा राम" को बीते कल के "राजा राम" से बेहतर बनाइए। साथ ही प्रयास यह रहे कि आने वाले कल का "राजा राम" आज वाले "राजा राम" से भी श्रेष्ठतर हो। सतयुग के "राजा" (सत्य श्री हरिश्चंद्र) सीधे-सादे, भोले रहे होंगे। एक ही गुण, सत्यगुण-सम्पन्न। शायद इसीलिए अपना सारा राजपाट गंवा बैठे। पत्नी (रानी सेव्या) और पुत्र (रोहित) को भी खो दिए। कोई नहीं पूजता है उन्हें। याद भी नहीं करता है कोई।

         त्रेता के राजा "राम" (श्री राम) 12 गुणों के स्वामी हुए। बिना अपनी राजशाही सेना के, शत्रुओं का संहार कर अपनी प्रतिष्ठा-पत्नी (सीता) को वापस प्राप्त किए। अपने राज्य की सीमाओं को सुरक्षित किए। अश्वमेध किए। असफल रहे। फिर भी पूजित हुए। वन्दनीय हुए। पर अनुकरणीय नहीं बन पाए। प्रेरणादायक नहीं बन पाए।

   द्वापर के राजा "यादवराज" (श्री कृष्ण) यदुकुलभूषण देवकीनंदन 16 गुणों के आगार हुए। सभी कलाओं में निपुण। कुछ नहीं खोया। कुछ था ही नहीं खोने को। जेल में जन्म हुआ। कौन-सा कष्ट नहीं सहा! कौन-सी यातना नहीं झेली! संघर्षपूर्ण शैशव। अभावग्रस्त बचपन। कष्टप्रद कैशोर्य। यौवन और प्रौढ़ावस्था युद्धस्थल में स्वाहा। पर कभी उफ्फ तक नहीं किया। योगीराज कहलाए। पूजित हुए। कूजित हुए। वंदनीय हुए। नमनीय हुए। अनुकरणीय हुए।

     किसे इतनी अग्निपरीक्षाओं से गुजरना पड़ा होगा? आततायियों का सर्वनाश कर दिया। एक-एक को चुन-चुन के यमलोक का रास्ता दिखाया। नवीन समाज की स्थापना की। शस्त्र को हाथ नहीं लगाया। और युद्ध के बीच मैदान में, डंके की चोट पर घोषणा की - पार्थ!! मैं ही ईश्वर हूँ! मेरी शरण में आओ! मोक्ष दूंगा!
"सर्वधर्मान्परित्यज्य,
मामेकं शरणम ब्रज।
अहम त्वाम सर्वपापेभ्यो
मोक्षयिष्यामि मा शुचः।।"  
     
       इतने कष्टों के बाद निखरकर कोई, भगवान से कम बन भी क्या सकता है? सोना भी तो अधिक तपने पर कुंदन बन जाता है।

     जज का काम जज को करने दीजिए। वह अपना कार्य कुशलतापूर्वक कर सके इसलिए पुलिस और वकील को अपना-अपना काम करना पड़ेगा। तभी शांति और सुव्यवस्था बनी रहेगी और विजयदशमी मंगलमयी हो सकेगी। क्या आपको भी अपना काम दुबारा याद दिलाना पड़ेगा!!
शुभकामनाएं💐
- - -
डॉ. राजा राम यादव
19.10.2018
विजयदशमी

*  दशहरे वाले दिन अमृतसर में आतिशबाजी की वजह से लोग ट्रेन की आवाज नहीं सुन सके और पटरी पर खड़े होकर तमाशा देखने वाले कई लोगों की जानें चली गईं। ईश्वर इनके परिवार को इस घोर पीड़ा से उबरने का संबल प्रदान करे और मृतकों की आत्मा को शांति मिले। विनम्र श्रद्धांजलि!💐

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