Saturday, 24 November 2018

कल आज और कल

           कल आज और कल

      एक समय था जब गांधी जी किसी मार्ग-मकसद पर निकलते थे तो हजारों लोग साथ हो लेते थे। बिना कुछ सोचे। बिना कुछ समझे। बिना किसी तर्क-वितर्क के। निश्छल, निष्कपट, निःस्वार्थ, निरपेक्ष भाव से। आज कोई बड़ा से बड़ा नेता क्या स्वयं ब्रह्मा जी भी पृथ्वी पर आ जाएं तो पचास सवाल करेंगे लोग। इतनी इन्क्वायरी होगी कि वे भी कह बैठेंगे, ये कहां आ गए!

       तर्क करना ज़रूरी है। तर्क से नए तथ्यों का उद्घाटन होता है। परन्तु हरेक व्यक्ति के वितर्कों और कुतर्कों का उत्तर आप नहीं दे सकते। फिर आप अपनी बात कह ही नहीं पाएंगे। आप रास्ते में ही रह जाएंगे। लक्ष्य तक नहीं पहुंच पाएंगे। अगर आपको लक्ष्य तक पहुंचना है तो दृष्टि लक्ष्य पर गड़ाए रखिए। रास्ते में मिलने वाली सारी बाधाओं और समस्याओं का समाधान करने लगे तो आप स्वयं समस्याग्रस्त हो जाएंगे। फिर आप समाधान का हिस्सा नहीं रह पाएंगे। राह में पड़ने वाले सारे पशुओं को ढेले मारने लगे, सारे जानवरों से उलझने लगे तो आप मंजिल पर नहीं पहुंच पाएंगे। इसलिए रास्ते में मिलने वाले हर केकड़े को कंकर मारना आवश्यक नहीं है। बस बढ़ते जाइए। कहते हैं-

"अज्ञ: सुखमाराध्यः सुखतरमाराध्यते विशेषज्ञः।
ज्ञानलवदुर्विदग्धं ब्रह्मापि तं नरं न रञ्जयति।।"

      अर्थात मूर्खों को आसानी से समझाया जा सकता है। ज्ञानियों को और भी आसानी से समझाया जा सकता है। परंतु जो, है तो ज्ञानहीन पर खुद को सर्वज्ञ समझता है उसे ब्रह्मा भी नहीं समझा सकते हैं।

    इसलिए लक्ष्य पर सदैव अपनी नजरें टिकाए रहिए। मंजिल की ओर अग्रसर रहिए। कोई क्या बोलता है, उस पर ध्यान मत दीजिए। जब तक संघर्षरत रहेंगे तब तक आलोचना ही मिलेगी और जब सफल हो जाएंगे तो प्रशंसा। दोनों ही स्थिति में कुछ न कुछ मिलेगा ही : सफल हुए तो सफलता, असफल हुए तो सीख।

          "मंजिल मिले, मिले न मिले;
                 उसका ग़म नहीं;
   मंजिल की जुस्तजू में मेरे अरमां तो हैं।"

(जुस्तजू- खोज, तलाश, अन्वेषण
अरमां- आकांक्षा, लालसा, इच्छा, कामना)
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डॉ. राजा राम यादव
21.11.2018

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