Sunday, 25 November 2018

शिक्षक और आधुनिक समाज

          शिक्षक और आधुनिक समाज

      समय के साथ शिक्षकों का सम्मान कम हुआ है इससे इनकार नहीं किया जा सकता है। इसके लिए सोना और सुनार दोनों जिम्मेवार हैं। एक तरफ जहां शिक्षा व्यापार बन चुकी है वहीं दूसरी तरफ छात्र अपने शिक्षकों को तरक्की के लिए सीढ़ी-मात्र समझने लगे हैं। यहाँ तक तो कोई दिक्कत नहीं है पर जब असामाजिक और अनैतिक कृत्य होते हैं तो दिल दहल जाता है। सुरक्षा का ध्यान करके शिक्षक अपनी भूमिका को सीमित करने लग जाते हैं। और यहीं से गुणवत्ता का ह्रास आरम्भ हो जाता है। संत तुलसी कहते हैं-
"सचिव, वैद, गुरु तीन जो;
प्रिय बोलहिं भय आस।
राज,धर्म, तन तीनि कर;
होइ बेग ही नाश।।"
     
        भारत में शिक्षकों के पास कोई विशेषाधिकार नहीं है। उनके ऊपर सिर्फ दायित्व ही दायित्व है। फिर रचनात्मक सोच कैसे विकसित होगी। जहां भी देखिए लोग शिक्षा व्यवस्था को कोसने लग जाते हैं। अपनी सारी असफलताओं का ठीकरा विद्यालय और शिक्षा व्यवस्था पर फोड़ने लग जाते हैं। छात्रों में शिक्षकों के प्रति भय और सम्मान में गिरावट के कारण माता-पिता भी हैं। अगर माता-पिता अपने बच्चों को घर पर उचित शिक्षा दें तो शिक्षक के द्वारा विद्यालय में दी गई शिक्षा अधिक कारगर सिद्ध होगी और उसे जीवन के अनेक क्षेत्रों में एक साथ अधिक से अधिक फायदा मिल सकेगा।

      समाज के उत्थान में शिक्षक, समाज, अभिभावक और छात्र समान रूप से महत्वपूर्ण हैं। शिक्षक भी इसी समाज का एक व्यक्ति है। साथ ही, आज का छात्र कल का शिक्षक है। किसी की बुराई करके उससे अच्छा काम नहीं लिया जा सकता है। किसी का अपमान और अनादर करके उससे बेहतर परिणाम की अपेक्षा नहीं की जा सकती है। हम भूल जाते हैं कि जब तक हम अपने हिस्से का दायित्व नहीं निभाएंगे तब तक दूसरों से उनके हिस्से का दायित्व निभाने की अपेक्षा नहीं कर सकते हैं।

     दुनिया कितनी भी तरक्की कर ले; चांद और मंगल के रास्ते बृहस्पति पर पहुंच जाए पर शिक्षक का महत्व कभी कम नहीं हो सकता है। शिक्षक वे होते हैं जो गलतियां करने पर कान भी उमेठते हैं और उपलब्धियों पर पीठ भी थपथपाते हैं। इसी से नए लक्ष्य निर्धारित करने और नवीन कीर्तिमान स्थापित करने ले लिए आवश्यक ऊर्जा और उत्साह का संचार होता है। सन्त कबीर कहते हैं-
"गुरु कुम्हार शिष्य कुंभ है,
गढ़ि-गढ़ि काढ़े खोट।
अंतर हाथ सहार दे, बाहर मारे चोट।।"

      गुरु का दिया दंड भी आत्मीय प्यार से लबरेज होता है, छात्र को नई दिशा दिखाने के लिए होता है। गूगल कान नहीं उमेठ सकता है, झिड़कियां नहीं सुना सकता है। गूगल के डर या सम्मान में उससे छुपकर टिफिन नहीं खाते हैं। गूगल के डर से बाथरूम जाने के बहाने पूरे विद्यालय की परिक्रमा करते हुए 5 मिनट का काम 15 मिनट में कर के आने का अवसर नहीं मिलता है। यानी गूगल हमारे सख्त परन्तु सहृदय, दृढ़ परन्तु सहज और गुस्सैल परन्तु आत्मीय शिक्षक का स्थान नहीं ले सकता है।

    आप सभी छात्रों, अभिभावकों, अनुभवी प्रोफेशनलों, व्यवसायियों, उद्यमियों, उद्योगपतियों, कामगारों और समाज के निर्माण व उत्थान में योगदान देने वाले समस्त सार्थक तत्वों के अंदर विराजमान शिक्षकों को सादर नमन। आइए, अपने हिस्से का दायित्व निभाएं। दूसरे के क्षेत्र में अनाधिकृत घुसपैठ न करें। अपने अधिकारों को उससे पहले सीमित कर लें जहां से दूसरों की नाक शुरू होती है। सस्नेह:
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डॉ. राजा राम यादव
राजभाषा अधिकारी/दिल्ली मेट्रो

दम तोड़ते सार्वजनिक प्रतिष्ठान

दम तोड़ते सार्वजनिक प्रतिष्ठान

   व्यक्तिगत स्वार्थ, प्रशासनिक अवहेलना और स्थानीय उदासीनता के कारण कई सार्वजनिक प्रतिष्ठान आज दम तोड़ने लगे हैं। लोग तात्कालिक फायदे के लिए सार्वजनिक प्रतिष्ठानों को लांछित करने, इमारतों को क्षतिग्रस्त करने और संस्थाओं को नुकसान पहुंचाने से भी नहीं कतराते हैं। इन प्रतिष्ठानों की खाली पड़ी जमीन को हड़प कर अपने खेत में मिला लेने की फिराक में रहते हैं।

        हम में से कुछ लोग शायद समस्तीपुर जिले के हसनपुर प्रखंड अंतर्गत स्थित गजपत्ति (गजपति), सर्कल अस्पताल से वाकिफ़ होंगे। सन 87 के विनाशकारी बाढ़ से पहले तक इस अस्पताल का अपना वैभव था। आसपास के 20 से भी अधिक गांवों के लोग यहां इलाज कराते थे। चिकित्सा अधिकारी डॉ. अरुण कुमार राय ने अपनी विशेषज्ञता और उत्कृष्ट सेवा से इस अस्पताल की श्रीवृद्धि की। दवाइयों की कोई कमी नहीं रहती थी। शल्यक्रिया संबंधी सामग्री प्रचुरता में उपलब्ध रहती थी। परिवार नियोजन से सम्बंधित कई बड़े-बड़े कार्यक्रमों का सफलतापूर्वक आयोजन इसकी विश्वसनीयता के प्रमाण रहे हैं। इसके कंपाउंडर के सरकारी आवास पर टी वी एंटीना टँगा था। उन दिनों घरों पर टी वी एंटीना लगा होना बड़ी बात थी, सम्पन्नता की निशानी! लोग यहां रामायण और महाभारत सीरियल देखने दूर-दूर से आते थे।

         परन्तु आज यह अस्पताल पूर्णतः उपेक्षित है। मकान जर्जर हो चुके हैं। डाक्टरों और कंपाउंडरों की किल्लत है। दवाइयों का सर्वथा अभाव है। इसके लिए स्थानीय निवासी विशेष रूप से जिम्मेवार हैं। लोगों ने सर्कल और अस्पताल की खाली पड़ी जमीन को हड़प कर अपने खेत में मिला लिया है। इस अस्पताल को पुनर्जीवित करने और इसका लाभ आम जनों तक पहुँचाने के लिए सबसे पहले जमीन खाली कराना अनिवार्य है।

         ऐसा ही एक गांव है मौरकाही, गजपत्ति (गजपति) के पास ही। इस गांव में 87 के बाद बिजली, सीधे 2017 में आई। बिथान प्रखंड में पड़ता है। दो टोले हैं इसमें- पुबारी (पूरब) और पछिमबारी (पश्चिम) टोल। दोनों में एक-एक तालाब है। किसी ज़माने में यह इतना स्वच्छ था कि लोग पूजा प्रसाद तक यहीं साफ करते थे। स्नान-ध्यान और शंकर भगवान (शिवलिंग) पर जल यहीं से लेकर चढ़ाते थे। अब इन दोनों तालाबों का ये हाल है कि पशुओं के मल-मूत्र से पानी काला पड़ गया है। लोगों ने इसके किनारों के ऊपर घर बना लिए है। इन अतिक्रमणकारियों को कोई कुछ सलाह दे या मना करे तो मुफ्त में बैर हो जाएगा। इसी वजह से लोग इन्हें कुछ कहते नहीं हैं और इन अतिचारियों के हौसले बुलंद होते जाते हैं।आलम ये है कि छठ पूजा, सरस्वती पूजा, सामा-चकेवा आदि त्योहार सामुहिक रूप से मना पाना लगभग असंभव-सा हो गया है।
   
           कमोबेश यही हाल लगभग सभी गांव-मुहल्लों का है। लोग अपने व्यक्तिगत फायदे के लिए सार्वजनिक स्थलों का अहित करने से चूकते नहीं हैं। फिर रोड, बिजली, पानी, विद्यालय, अस्पताल, समुदाय भवन आदि की अनुपलब्धता और इनके रखरखाव के साथ ही इनकी बदहाली के लिए सरकार को कोसते रहते हैं। प्रशासन बेख़बर है। जनता बेसुध है। अतिक्रमणकारी बेख़ौफ है। शायद इसी वजह से ये अमूल्य स्थल बदनसीबी का रोना रो रहे हैं।

        समिति बनानी पड़ेगी। प्रशासन पर दवाब बनाना पड़ेगा। निगरानी करनी पड़ेगी। झूठे वादे करके भोली-भाली जनता का विश्वास और सहानुभूति पाने वाले मक्कार और फ़रेबी जनप्रतिनिधियों को उसकी असलियत दिखानी पड़ेगी। सपनों का सब्ज़बाग दिखाकर वोट बटोरने वाले सफेदपोशों को आइना दिखाना पड़ेगा। इसी से समाधान हो सकेगा। देखते हैं कब तक कोई क्रांतिवीर अपनी कलम, कुदाल कला या कौशल से इसे बदनसीबी से उबार पाने में सफल हो पाता है! जनता की नींद कब खुलती है!!
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डॉ. राजा राम यादव
मो-9911894311
12.10.2018

 

Saturday, 24 November 2018

कल आज और कल

           कल आज और कल

      एक समय था जब गांधी जी किसी मार्ग-मकसद पर निकलते थे तो हजारों लोग साथ हो लेते थे। बिना कुछ सोचे। बिना कुछ समझे। बिना किसी तर्क-वितर्क के। निश्छल, निष्कपट, निःस्वार्थ, निरपेक्ष भाव से। आज कोई बड़ा से बड़ा नेता क्या स्वयं ब्रह्मा जी भी पृथ्वी पर आ जाएं तो पचास सवाल करेंगे लोग। इतनी इन्क्वायरी होगी कि वे भी कह बैठेंगे, ये कहां आ गए!

       तर्क करना ज़रूरी है। तर्क से नए तथ्यों का उद्घाटन होता है। परन्तु हरेक व्यक्ति के वितर्कों और कुतर्कों का उत्तर आप नहीं दे सकते। फिर आप अपनी बात कह ही नहीं पाएंगे। आप रास्ते में ही रह जाएंगे। लक्ष्य तक नहीं पहुंच पाएंगे। अगर आपको लक्ष्य तक पहुंचना है तो दृष्टि लक्ष्य पर गड़ाए रखिए। रास्ते में मिलने वाली सारी बाधाओं और समस्याओं का समाधान करने लगे तो आप स्वयं समस्याग्रस्त हो जाएंगे। फिर आप समाधान का हिस्सा नहीं रह पाएंगे। राह में पड़ने वाले सारे पशुओं को ढेले मारने लगे, सारे जानवरों से उलझने लगे तो आप मंजिल पर नहीं पहुंच पाएंगे। इसलिए रास्ते में मिलने वाले हर केकड़े को कंकर मारना आवश्यक नहीं है। बस बढ़ते जाइए। कहते हैं-

"अज्ञ: सुखमाराध्यः सुखतरमाराध्यते विशेषज्ञः।
ज्ञानलवदुर्विदग्धं ब्रह्मापि तं नरं न रञ्जयति।।"

      अर्थात मूर्खों को आसानी से समझाया जा सकता है। ज्ञानियों को और भी आसानी से समझाया जा सकता है। परंतु जो, है तो ज्ञानहीन पर खुद को सर्वज्ञ समझता है उसे ब्रह्मा भी नहीं समझा सकते हैं।

    इसलिए लक्ष्य पर सदैव अपनी नजरें टिकाए रहिए। मंजिल की ओर अग्रसर रहिए। कोई क्या बोलता है, उस पर ध्यान मत दीजिए। जब तक संघर्षरत रहेंगे तब तक आलोचना ही मिलेगी और जब सफल हो जाएंगे तो प्रशंसा। दोनों ही स्थिति में कुछ न कुछ मिलेगा ही : सफल हुए तो सफलता, असफल हुए तो सीख।

          "मंजिल मिले, मिले न मिले;
                 उसका ग़म नहीं;
   मंजिल की जुस्तजू में मेरे अरमां तो हैं।"

(जुस्तजू- खोज, तलाश, अन्वेषण
अरमां- आकांक्षा, लालसा, इच्छा, कामना)
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डॉ. राजा राम यादव
21.11.2018

शांति बनाम शक्ति-प्रदर्शन!

शांति बनाम शक्ति-प्रदर्शन!

         सत्य और अहिंसा के पुजारी महात्मा गांधी शांति के प्रबल पक्षपोषक रहे हैं। आत्मा की शक्ति से समूचे संसार को विजित करने का माद्दा रखने वाले महात्मा बापू ने दुनिया को आत्मा की शक्ति से साक्षात्कार कराया। शांति की महत्ता को पुनर्स्थापित किया और संसार को आत्ममंथन के लिए आमंत्रित-प्रेरित किया।
           जय जवान, जय किसान का नारा बुलंद करने वाले धरती के लाल; लाल बहादुर शास्त्री जी ने शांति के लिए युद्ध की आवश्यकता को भी जायज ठहराया। आरोपित युद्ध के समुचित प्रतिकार की वकालत की। अशांति के अंत और शान्ति की स्थापना के लिए संघर्ष को सही करार दिया। क्योंकि शांति नायाब है। यह किसी भी कीमत पर मिले तो सस्ती ही है।

         शांति, इस छोटे से शब्द में संसार का सारा विभु, सारा ऐश्वर्य और सम्पूर्ण आनंद व्याप्त है। दुनिया के सारे नेक और सात्विक विचार शांति में पनपते हैं और शांति में ही फलीभूत होते हैं। शांति में सुख है। शांति में समृद्धि है। शांति में परमानंद है। शांति ही वह वस्तु है जिसके शोध और संधान में सारे ऋषि-मुनि, दार्शनिक-विचारक, साहित्यकार-राजनीतिज्ञ, सामाजिक और योद्धा युगों-युगों से लीन हैं। उन सबने यह अनुभव किया कि युद्ध से समस्याओं का समाधान नहीं होता है बल्कि समस्याएँ और भी बलवती होती है। सुलझने के वजाय और भी उलझती हैI दरअसल युद्ध ही सारी समस्याओं का असली कारण है इसलिए वे सारे तपोबल, योगबल और आत्मबल से पूरे मनोयोग के साथ शांति की तलाश में यत्र-तत्र-सर्वत्र भटकते रहे I

       शांति दो स्तरों पर अनुभूत होती है- व्यक्तिगत रूप से आत्मा के स्तर पर और सामूहिक रूप से समुदाय के स्तर पर। आज विश्व के इतने सारे देश जब परमाणु हथियारों से लैश हो चुके हैं तो शांति, विमर्श का विषय नहीं बल्कि आवश्यकता बन चुकी है। विभिन्न मतों-विचारों में विभक्त विश्व को स्नेह, प्रेम, सौहार्द और सद्भाव की आवश्यकता है। आत्म-मंडन की जगह आत्ममंथन ज़रूरी है। खाइयों को पाटने की आवश्यकता है। साधन-विहीनता और साधन-विपुलता के खड्डों को भरने की ज़रूरत है। अतिशय सुख और अतिशय दुख की अतिशयता को समाप्त कर सन्तुलन स्थापित करने की ज़रूरत है। 'दिनकर' कहते हैं-

"शांति नहीं तब तक,
जब तक सुख-भाग न नर का सम हो।
नहीं किसी को बहुत अधिक हो,
नहीं किसी को कम हो।"

           इस दुनिया का निर्माण प्रेम के आधार पर हुआ है, प्रेम के कारण ही पल रहा है और प्रेम पर ही इसका अस्तित्व टिका हुआ है। मस्तिष्क पर शासन सदा-सर्वदा के लिए नहीं किया जा सकता है। चिरस्थायी स्थान तो हृदय से ही बनाया जा सकता है। सर्वत्र प्रेम ही प्रेम आवश्यक है। नफरत के लिए यहां कोई स्थान नहीं है। 'कबीर' कहते हैं -
"ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय।" परन्तु- - - प्रेम पाने के लिए प्रेम अर्पण करना पड़ता है, कुछ कष्ट सहने पड़ते हैं, कुछ मूल्य चुकाने पड़ते हैं। इसलिए वे आगे कहते हैं-

"प्रेम न बाड़ी ऊपजै, प्रेम न हाट बिकाय।
राजा परजा जेहि रुचै, सीस देइ लै जाय।"

          आज विश्व जिस ग्लोबल विलेज की अवधारणा को साकार करने की दिशा में प्रयासरत है वस्तुतः यह भारत की ही पौराणिक परंपरा है। हम 'वसुधैव कुटुंबकम' के पक्षपोषक और विश्वशांति के अग्रणी ध्वजवाहक रहे हैं। भारतीय संस्कृति मानव धर्म की जय, अधर्म के नाश, प्राणियों में सद्भावना और विश्व के कल्याण की कामना करने वाली संस्कृति का नाम है। विश्व के सभी देश इस विराट अवधारणा को अब स्वीकार करते हैं।

         विज्ञान की प्रगति ने आज पूरे विश्व को एकाकार कर दिया है। रही-सही कसर इंटरनेट ने पूरी कर दी है। फोन और इंटरनेट के माध्यम से संपूर्ण विश्व से सेकेंडों में जुड़ा जा सकता है और अपनी बातें पहुँचाई जा सकती है। संचार के इन तीव्र माध्यमों का प्रयोग कर प्रेम, सहिष्णुता और सौहार्द की त्रिवेणी प्रवाहित करने की जरूरत है।

             आइए, अमन-चैन का रास्ता अपनाएं। समस्त जीव-जगत के कल्याण का मार्ग प्रशस्त करें। एक-दूसरे की स्वतंत्रता का सम्मान करें। अपने अधिकारों को उससे पहले नियंत्रित कर लें जहां से दूसरों के अधिकारों की शुरुआत होती है। अपने कर्तव्यों को इस कदर व्यापक कर लें कि हरेक का कष्ट अपना कष्ट प्रतीत होने लगे। अपनी सोच को इतना विकसित कर लें कि सहानुभूति की जगह समानुभूति उत्पन्न हो जाए - - - ताकि - - -

''प्राणियों में सद्भावना हो,
विश्व का कल्याण हो।।''
- - -
डॉ. राजा राम यादव
02.10.2018
(गांधी-शास्त्री जयंती)
मोब-9911894311

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Friday, 23 November 2018

विजयदशमी : पुरुषार्थ की विजय।

विजयदशमी : पुरुषार्थ की विजय।

💐मंगल कामनाएं💐

    देवी जागरण में गया था। महाअष्टमी के अवसर पर। बहुत सारे गीत गाए मैंने। लोग आनन्द में सराबोर थे। क्या महिला क्या पुरुष! सभी झूम-झूम के, नाच-नाच के, बेसुध थे। फिर शुरू किया "मैं तो आरती उतारूँ रे, संतोषी माता की।" माहिलाएँ गरबा-डांडिया के आनन्दसागर में निमग्न हो गईं। भक्ति, उमंग और संगीत की त्रिवेणी प्रवाहित हो चली। मैं भी आकंठ संपृक्त हो उठा। लोग कहते हैं, अच्छा गाता हूँ। अच्छा क्या? कोई ख़ास नहीं। बस, दिल से गाता हूँ। उन्हें अच्छा लगता है, ये उनकी अच्छाई है।

      एक गीत था "माता रानी फल देगी, आज नहीं तो कल देगी।" सोचा, पूरे देश में यही बयार बहनी चाहिए। आशा की डोर से बंधे रहेंगे। रामदरश मिश्र जी की पंक्तियां अनायास याद आ गईं-
"किसी को गिराया न खुद को उछाला,
कटा जिंदगी का सफर धीरे-धीरे।
जहां आप पहुंचे छलांगें लगाकर,
वहां मैं भी पहुंचा मगर धीरे-धीरे।।"

         मिश्र जी से ही क्यों, पहले से भी जानते हैं- "कारज धीरे होत हैं, काहे होत अधीर. . . . . ।"

         फिर हम झोलियां क्यों फैलाते हैं भगवान के आगे? क्यों नहीं तरुवर के फलने तक इसे सींचते रहने का धैर्य धारण करते हैं? हम भक्ति, श्रद्धा और आनन्द की वैतरणी में स्नान करने आए हैं। सौदा करने तो नहीं आए हैं न? भगवान, तुम मेरा ये काम कर दो तो मैं जगराता करवाउंगी। मेरा ये करा दो- - - तो मैं सवा सेर प्रसाद चढ़ाऊंगी। - - - जोड़ा नारियल चढ़ाऊंगी - - - । क्यों? ये व्यापार क्यों? याचना क्यों? अरे, जिस चीज की कमी है या जिसकी मुझे दरकार है, अपने पुरुषार्थ से उसे हासिल करूँगा। भीख क्यों माँगूंगा!

   अपनी योग्यताओं का विकास कीजिए। सद्बुध्दि मांगिए। सद्विचार मांगिए। पुरुषार्थ प्रदर्शन के लिए अवसर मांगिए। ऐसा क्यों नहीं कहते - प्रभु! जीवन का यह युद्ध मेरा है। सो युद्ध तो मैं ही लड़ूंगा पर तुम मेरा सारथी बनकर सदैव मार्गदर्शन करते रहना ताकि मैं भटक न जाऊं। तीर तो मैं ही चलाऊंगा, तुम बस मेरे तीर को सही निशाने तक पहुंचा देना।

      शिवलिंग पर जलाभिषेक कीजिए। श्रीराम को पुष्प अर्पित कीजिए। कृष्ण को नैवेद्य चढ़ाइए। यह श्रद्धा है। भक्ति है। आपको सम्बल मिलेगा। पर, वहां से प्रेरणा लीजिए। सशक्त होंगे आप। सामर्थ्यवान बनेंगे आप। अपने पुरुषार्थ का प्रदर्शन कीजिए। सफल होंगे आप। शिवलिंग पर अपना सर पटक-पटक कर अपने प्राण गँवा देंगे, तो भी सफलता नहीं मिलेगी। रावण दहन की नौटंकी में इतने बेख़बर मत बन जाइए कि खुद ही ख़बर बन जाइए।*

         इसलिए, गाय-गाय; गाय-गाय का जाप करना बंद कीजिए। गाय को दुहिये। उस दूध को पीजिए। कुश्ती कीजिए। तब अगर भाग्य और भगवान ने चाहा तो आप पहलवान बन जाएंगे। राम-राम, राम-राम का सिर्फ जाप मत कीजिए। राम को समझिए। उनका सच्चरित्र अपने जीवन में उतारिए। फिर मर्यादापुरुषोत्तम श्री राम ने चाहा तो आप रामत्व को प्राप्त कर सकेंगे।
"दशरथ सुत तिहुँ लोक बखाना,
राम नाम का मरम है जाना??"

     कृष्ण को समझने का प्रयत्न कीजिए। उनकी सीख को अपने जीवन में उतारिए। फिर यदुकुलनायक अहीर-सम्राट ने कृपा की तो आप कृष्णत्व को प्राप्त कर सकेंगे। पूरी गीता के सभी 18 अध्यायों में कर्मवाद के सिद्धांत को ही प्रतिपादित किया है यादव-शिरोमणि श्री कृष्ण ने।
"कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन. . . . ."

        कर्मवीरों को वह सब कुछ मिला है जो उसे चाहिए। जिसकी उसे दरकार है। और जिसके लिए वह सर्वथा उपयुक्त, सर्वथा योग्य है। वह पृथ्वी के समस्त सुखों को भोगता है। समाज के लिए मिसाल कायम करता है। आने वाली पीढ़ी के लिए प्रेरणा स्रोत सिद्ध होता है। भाग्यवादी को केवल वही मिल पाता है जिसे कर्मवादियों ने छोड़ दिया है। जूठन खाने वाला मत बनिए। कर्मवीर बनिए। दयावीर बनिए। दानवीर बनिए। युद्धवीर बनिए।

      सतयुग में युद्ध देवों और असुरों में था। दोनों अलग-अलग लोकों के थे। देवलोक और असुरलोक के। त्रेता में युद्धस्थल थोड़ा निकट आया। एक ही लोक - पृथ्वीलोक के, बस दो अलग-अलग राज्य। अवधपति और लंकापति का युद्ध। युद्धस्थल बना समुंदर पार। द्वापर में युद्धस्थल और निकट आ गया। एक ही परिवार के भाई! आपस में लड़ खपे। युद्धस्थल बना उन्हीं के ही राज्य का एक क्षेत्र - कुरुक्षेत्र! अब, कलियुग चल रहा है। युद्धक्षेत्र और निकटतर आ गया है- अपना ही आत्मस्थल! अपना ही चित्त, युद्धस्थल बना हुआ है। अपने भीतर की विकृतियों को मिटाइए।

         जागरण में ज़रूर जाइए। अपने अंदर के राम का "जागरण" कीजिए और रावण का दमन कीजिए। कृष्ण का उद्बोधन कीजिए और कंस का शमन कीजिए। अपने पौरुष को जागृत कीजिए। आलस्य और अकर्मण्यता का त्याग कीजिए। अपनी समस्त संकीर्णताओं को समाप्त कीजिए। ईर्ष्या, द्वेष, स्वार्थ, लोभ, मोह, अहंकार रूपी दानवों से जितना ऊंचा उठ सकेंगे देवत्व के उतने ही करीब पहुंच सकेंगे। और हां, अगर हो सके तो अगली बार अपने स्कूलों को भी पंडालों की तरह सजाइए!!

    आज के "राजा राम" को बीते कल के "राजा राम" से बेहतर बनाइए। साथ ही प्रयास यह रहे कि आने वाले कल का "राजा राम" आज वाले "राजा राम" से भी श्रेष्ठतर हो। सतयुग के "राजा" (सत्य श्री हरिश्चंद्र) सीधे-सादे, भोले रहे होंगे। एक ही गुण, सत्यगुण-सम्पन्न। शायद इसीलिए अपना सारा राजपाट गंवा बैठे। पत्नी (रानी सेव्या) और पुत्र (रोहित) को भी खो दिए। कोई नहीं पूजता है उन्हें। याद भी नहीं करता है कोई।

         त्रेता के राजा "राम" (श्री राम) 12 गुणों के स्वामी हुए। बिना अपनी राजशाही सेना के, शत्रुओं का संहार कर अपनी प्रतिष्ठा-पत्नी (सीता) को वापस प्राप्त किए। अपने राज्य की सीमाओं को सुरक्षित किए। अश्वमेध किए। असफल रहे। फिर भी पूजित हुए। वन्दनीय हुए। पर अनुकरणीय नहीं बन पाए। प्रेरणादायक नहीं बन पाए।

   द्वापर के राजा "यादवराज" (श्री कृष्ण) यदुकुलभूषण देवकीनंदन 16 गुणों के आगार हुए। सभी कलाओं में निपुण। कुछ नहीं खोया। कुछ था ही नहीं खोने को। जेल में जन्म हुआ। कौन-सा कष्ट नहीं सहा! कौन-सी यातना नहीं झेली! संघर्षपूर्ण शैशव। अभावग्रस्त बचपन। कष्टप्रद कैशोर्य। यौवन और प्रौढ़ावस्था युद्धस्थल में स्वाहा। पर कभी उफ्फ तक नहीं किया। योगीराज कहलाए। पूजित हुए। कूजित हुए। वंदनीय हुए। नमनीय हुए। अनुकरणीय हुए।

     किसे इतनी अग्निपरीक्षाओं से गुजरना पड़ा होगा? आततायियों का सर्वनाश कर दिया। एक-एक को चुन-चुन के यमलोक का रास्ता दिखाया। नवीन समाज की स्थापना की। शस्त्र को हाथ नहीं लगाया। और युद्ध के बीच मैदान में, डंके की चोट पर घोषणा की - पार्थ!! मैं ही ईश्वर हूँ! मेरी शरण में आओ! मोक्ष दूंगा!
"सर्वधर्मान्परित्यज्य,
मामेकं शरणम ब्रज।
अहम त्वाम सर्वपापेभ्यो
मोक्षयिष्यामि मा शुचः।।"  
     
       इतने कष्टों के बाद निखरकर कोई, भगवान से कम बन भी क्या सकता है? सोना भी तो अधिक तपने पर कुंदन बन जाता है।

     जज का काम जज को करने दीजिए। वह अपना कार्य कुशलतापूर्वक कर सके इसलिए पुलिस और वकील को अपना-अपना काम करना पड़ेगा। तभी शांति और सुव्यवस्था बनी रहेगी और विजयदशमी मंगलमयी हो सकेगी। क्या आपको भी अपना काम दुबारा याद दिलाना पड़ेगा!!
शुभकामनाएं💐
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डॉ. राजा राम यादव
19.10.2018
विजयदशमी

*  दशहरे वाले दिन अमृतसर में आतिशबाजी की वजह से लोग ट्रेन की आवाज नहीं सुन सके और पटरी पर खड़े होकर तमाशा देखने वाले कई लोगों की जानें चली गईं। ईश्वर इनके परिवार को इस घोर पीड़ा से उबरने का संबल प्रदान करे और मृतकों की आत्मा को शांति मिले। विनम्र श्रद्धांजलि!💐

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