शिक्षक और आधुनिक समाज
समय के साथ शिक्षकों का सम्मान कम हुआ है इससे इनकार नहीं किया जा सकता है। इसके लिए सोना और सुनार दोनों जिम्मेवार हैं। एक तरफ जहां शिक्षा व्यापार बन चुकी है वहीं दूसरी तरफ छात्र अपने शिक्षकों को तरक्की के लिए सीढ़ी-मात्र समझने लगे हैं। यहाँ तक तो कोई दिक्कत नहीं है पर जब असामाजिक और अनैतिक कृत्य होते हैं तो दिल दहल जाता है। सुरक्षा का ध्यान करके शिक्षक अपनी भूमिका को सीमित करने लग जाते हैं। और यहीं से गुणवत्ता का ह्रास आरम्भ हो जाता है। संत तुलसी कहते हैं-
"सचिव, वैद, गुरु तीन जो;
प्रिय बोलहिं भय आस।
राज,धर्म, तन तीनि कर;
होइ बेग ही नाश।।"
भारत में शिक्षकों के पास कोई विशेषाधिकार नहीं है। उनके ऊपर सिर्फ दायित्व ही दायित्व है। फिर रचनात्मक सोच कैसे विकसित होगी। जहां भी देखिए लोग शिक्षा व्यवस्था को कोसने लग जाते हैं। अपनी सारी असफलताओं का ठीकरा विद्यालय और शिक्षा व्यवस्था पर फोड़ने लग जाते हैं। छात्रों में शिक्षकों के प्रति भय और सम्मान में गिरावट के कारण माता-पिता भी हैं। अगर माता-पिता अपने बच्चों को घर पर उचित शिक्षा दें तो शिक्षक के द्वारा विद्यालय में दी गई शिक्षा अधिक कारगर सिद्ध होगी और उसे जीवन के अनेक क्षेत्रों में एक साथ अधिक से अधिक फायदा मिल सकेगा।
समाज के उत्थान में शिक्षक, समाज, अभिभावक और छात्र समान रूप से महत्वपूर्ण हैं। शिक्षक भी इसी समाज का एक व्यक्ति है। साथ ही, आज का छात्र कल का शिक्षक है। किसी की बुराई करके उससे अच्छा काम नहीं लिया जा सकता है। किसी का अपमान और अनादर करके उससे बेहतर परिणाम की अपेक्षा नहीं की जा सकती है। हम भूल जाते हैं कि जब तक हम अपने हिस्से का दायित्व नहीं निभाएंगे तब तक दूसरों से उनके हिस्से का दायित्व निभाने की अपेक्षा नहीं कर सकते हैं।
दुनिया कितनी भी तरक्की कर ले; चांद और मंगल के रास्ते बृहस्पति पर पहुंच जाए पर शिक्षक का महत्व कभी कम नहीं हो सकता है। शिक्षक वे होते हैं जो गलतियां करने पर कान भी उमेठते हैं और उपलब्धियों पर पीठ भी थपथपाते हैं। इसी से नए लक्ष्य निर्धारित करने और नवीन कीर्तिमान स्थापित करने ले लिए आवश्यक ऊर्जा और उत्साह का संचार होता है। सन्त कबीर कहते हैं-
"गुरु कुम्हार शिष्य कुंभ है,
गढ़ि-गढ़ि काढ़े खोट।
अंतर हाथ सहार दे, बाहर मारे चोट।।"
गुरु का दिया दंड भी आत्मीय प्यार से लबरेज होता है, छात्र को नई दिशा दिखाने के लिए होता है। गूगल कान नहीं उमेठ सकता है, झिड़कियां नहीं सुना सकता है। गूगल के डर या सम्मान में उससे छुपकर टिफिन नहीं खाते हैं। गूगल के डर से बाथरूम जाने के बहाने पूरे विद्यालय की परिक्रमा करते हुए 5 मिनट का काम 15 मिनट में कर के आने का अवसर नहीं मिलता है। यानी गूगल हमारे सख्त परन्तु सहृदय, दृढ़ परन्तु सहज और गुस्सैल परन्तु आत्मीय शिक्षक का स्थान नहीं ले सकता है।
आप सभी छात्रों, अभिभावकों, अनुभवी प्रोफेशनलों, व्यवसायियों, उद्यमियों, उद्योगपतियों, कामगारों और समाज के निर्माण व उत्थान में योगदान देने वाले समस्त सार्थक तत्वों के अंदर विराजमान शिक्षकों को सादर नमन। आइए, अपने हिस्से का दायित्व निभाएं। दूसरे के क्षेत्र में अनाधिकृत घुसपैठ न करें। अपने अधिकारों को उससे पहले सीमित कर लें जहां से दूसरों की नाक शुरू होती है। सस्नेह:
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डॉ. राजा राम यादव
राजभाषा अधिकारी/दिल्ली मेट्रो
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