Sunday, 25 November 2018

दम तोड़ते सार्वजनिक प्रतिष्ठान

दम तोड़ते सार्वजनिक प्रतिष्ठान

   व्यक्तिगत स्वार्थ, प्रशासनिक अवहेलना और स्थानीय उदासीनता के कारण कई सार्वजनिक प्रतिष्ठान आज दम तोड़ने लगे हैं। लोग तात्कालिक फायदे के लिए सार्वजनिक प्रतिष्ठानों को लांछित करने, इमारतों को क्षतिग्रस्त करने और संस्थाओं को नुकसान पहुंचाने से भी नहीं कतराते हैं। इन प्रतिष्ठानों की खाली पड़ी जमीन को हड़प कर अपने खेत में मिला लेने की फिराक में रहते हैं।

        हम में से कुछ लोग शायद समस्तीपुर जिले के हसनपुर प्रखंड अंतर्गत स्थित गजपत्ति (गजपति), सर्कल अस्पताल से वाकिफ़ होंगे। सन 87 के विनाशकारी बाढ़ से पहले तक इस अस्पताल का अपना वैभव था। आसपास के 20 से भी अधिक गांवों के लोग यहां इलाज कराते थे। चिकित्सा अधिकारी डॉ. अरुण कुमार राय ने अपनी विशेषज्ञता और उत्कृष्ट सेवा से इस अस्पताल की श्रीवृद्धि की। दवाइयों की कोई कमी नहीं रहती थी। शल्यक्रिया संबंधी सामग्री प्रचुरता में उपलब्ध रहती थी। परिवार नियोजन से सम्बंधित कई बड़े-बड़े कार्यक्रमों का सफलतापूर्वक आयोजन इसकी विश्वसनीयता के प्रमाण रहे हैं। इसके कंपाउंडर के सरकारी आवास पर टी वी एंटीना टँगा था। उन दिनों घरों पर टी वी एंटीना लगा होना बड़ी बात थी, सम्पन्नता की निशानी! लोग यहां रामायण और महाभारत सीरियल देखने दूर-दूर से आते थे।

         परन्तु आज यह अस्पताल पूर्णतः उपेक्षित है। मकान जर्जर हो चुके हैं। डाक्टरों और कंपाउंडरों की किल्लत है। दवाइयों का सर्वथा अभाव है। इसके लिए स्थानीय निवासी विशेष रूप से जिम्मेवार हैं। लोगों ने सर्कल और अस्पताल की खाली पड़ी जमीन को हड़प कर अपने खेत में मिला लिया है। इस अस्पताल को पुनर्जीवित करने और इसका लाभ आम जनों तक पहुँचाने के लिए सबसे पहले जमीन खाली कराना अनिवार्य है।

         ऐसा ही एक गांव है मौरकाही, गजपत्ति (गजपति) के पास ही। इस गांव में 87 के बाद बिजली, सीधे 2017 में आई। बिथान प्रखंड में पड़ता है। दो टोले हैं इसमें- पुबारी (पूरब) और पछिमबारी (पश्चिम) टोल। दोनों में एक-एक तालाब है। किसी ज़माने में यह इतना स्वच्छ था कि लोग पूजा प्रसाद तक यहीं साफ करते थे। स्नान-ध्यान और शंकर भगवान (शिवलिंग) पर जल यहीं से लेकर चढ़ाते थे। अब इन दोनों तालाबों का ये हाल है कि पशुओं के मल-मूत्र से पानी काला पड़ गया है। लोगों ने इसके किनारों के ऊपर घर बना लिए है। इन अतिक्रमणकारियों को कोई कुछ सलाह दे या मना करे तो मुफ्त में बैर हो जाएगा। इसी वजह से लोग इन्हें कुछ कहते नहीं हैं और इन अतिचारियों के हौसले बुलंद होते जाते हैं।आलम ये है कि छठ पूजा, सरस्वती पूजा, सामा-चकेवा आदि त्योहार सामुहिक रूप से मना पाना लगभग असंभव-सा हो गया है।
   
           कमोबेश यही हाल लगभग सभी गांव-मुहल्लों का है। लोग अपने व्यक्तिगत फायदे के लिए सार्वजनिक स्थलों का अहित करने से चूकते नहीं हैं। फिर रोड, बिजली, पानी, विद्यालय, अस्पताल, समुदाय भवन आदि की अनुपलब्धता और इनके रखरखाव के साथ ही इनकी बदहाली के लिए सरकार को कोसते रहते हैं। प्रशासन बेख़बर है। जनता बेसुध है। अतिक्रमणकारी बेख़ौफ है। शायद इसी वजह से ये अमूल्य स्थल बदनसीबी का रोना रो रहे हैं।

        समिति बनानी पड़ेगी। प्रशासन पर दवाब बनाना पड़ेगा। निगरानी करनी पड़ेगी। झूठे वादे करके भोली-भाली जनता का विश्वास और सहानुभूति पाने वाले मक्कार और फ़रेबी जनप्रतिनिधियों को उसकी असलियत दिखानी पड़ेगी। सपनों का सब्ज़बाग दिखाकर वोट बटोरने वाले सफेदपोशों को आइना दिखाना पड़ेगा। इसी से समाधान हो सकेगा। देखते हैं कब तक कोई क्रांतिवीर अपनी कलम, कुदाल कला या कौशल से इसे बदनसीबी से उबार पाने में सफल हो पाता है! जनता की नींद कब खुलती है!!
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डॉ. राजा राम यादव
मो-9911894311
12.10.2018

 

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