वो क्या!
वो निर्झर क्या कोई निर्झर है?
जो चंचल नही तरंगों से।
वो जीवन क्या कोई जीवन है?
जो चलता नहीं उमंगों से।
वो तूफां क्या कोई तूफां है,
टकराए नहीं बबंडर से।
वे नदियां क्या कोई नदियां हैं?
मिल पाए नहीं समंदर से।
वो पत्थर क्या कोई पत्थर है?
गल जाए बादल-पानी से!
वो खाक! जवानी कहलाए,
डर जाए जो नादानी से।
सपनों से आंख चुराने का,
जो स्वांग हमेशा रचता हो।
वो ख़ाक कलेजा कहलाए,
जो खाली धकधक करता हो।
हाथों पर हाथ धरे बैठा,
वह ताज़महल जो रचता हो।
और बैठ हवाई किल्लों में,
बस खाली आहें भरता हो।
कुछ नादानी, कुछ अल्हड़पन,
कुछ दी-वा-ना-पन हो जाए।
और इस छोटे-से जीवन में
हम ख़ुद को, ख़ुद में पा जाएं।
कर डालो बस अपने मन की,
न कोई कहीं मलाल रहे।
हर फ़र्ज़ निभे इस जीवन के,
बस इतना तनिक ख़याल रहे!
बस इतना तनिक ख़याल रहे!
- - -
सस्नेह-
डॉ. राजा राम यादव
हिंदी भवन, नई दिल्ली
11.01.2019
No comments:
Post a Comment