बस नाच उठा
हुआ दरस जब यार! तुम्हारा,
जीवन-सोना नाच उठा।
नाच उठा, मन-मोर-पपीहा।
दिल का कोना नाच उठा।
यादें सारी ताज़ा हो गईं,
रूठा! फिर संसार उठा।
मन हर्षित, तन पुलकित होकर,
रोम-रोम झंकार उठा।
स्नेह-समर्पित उद्गारों से,
ज़र्रा-ज़र्रा नाच उठा।
स्नेहसिक्त-स्पर्श प्राप्त कर,
तन का तन्तु नाच उठा।
विरह-मिलन, प्राचीर-तीर पर,
सरिता-केवट नाच उठा।
आलिंगन या अभिनन्दन को,
मन का चेतक नाच उठा।
आओ सखे! आलिंगन दे दूं!
इतना कह जब आज उठा।
दूर! विकर्षित! निपट अकेले!
शायद मेरा यार रुठा!
सब कुछ अर्पण करने को,
धू-सरित अश्व-असवार उठा।
अट्टहास कर मन-दर्पण ने,
फिर ख़ुद को ललकार उठा।
अट्टहास कर मन-दर्पण ने,
फिर ख़ुद को ललकार उठा।
- - -
लोहड़ी और मकर संक्रांति की असीमानंत मंगल कामनाएं।
सस्नेह-💐
डॉ. राजा राम यादव
जन जागृति : Awakening People
13.01.2019
No comments:
Post a Comment