चरवाहा विद्यालय
बनाम
मोहल्ला क्लिनिक
- - - - - - -
जो हश्र बिहार में चरवाहा विद्यालय का हुआ वही हाल दिल्ली में मोहल्ला क्लिनिक का है। पते की बात तो ये है कि इन दोनों राज्यों को प्रायः विशिष्ट राज्य माना जाता है। एक ओर बिहार को जहाँ सांस्कृतिक दृष्टि से उन्नत और राजनैतिक दृष्टि से परिपक्व माना जाता है वहीं दूसरी ओर दिल्ली को शैक्षिक दृष्टि से सबल और आर्थिक दृष्टि से सम्पन्न माना जाता है। कहते हैं, बिहार का बच्चा जन्म से ही राजनीति सीख कर आता है और दिल्ली का बच्चा पैदा होने के साथ ही प्रेक्टिकल यानी व्यवहार कुशल होता है। दोनों राज्य अपने मानकों व मापदण्डों के अनुरूप फैसले करता है।
पर इन दोनों के मुख्य प्रतिनिधियों तथा नीति नियंताओ को कैसे समझाया जाए कि जैसे गाय, भैंस और बैल को चराते हुए पढ़ाई पर ध्यान केंद्रित कर पाना मुश्किल है वैसे ही झोपड़ी की चारपाई पर लिटाकर रोगियों का इलाज असंभव है! उन्हें कैसे समझाया जाए कि शिक्षा, साधना का विषय है और चिकित्सा, साधन की वस्तु है। शिक्षा के लिए एकाग्रता की आवश्यकता होती है और चिकित्सा के लिए सामग्री की। शिक्षा को सुचारु करना है तो शांति दीजिए, एकाग्रता दीजिए और अगर चिकित्सा को सुनिश्चित करना है तो सामग्री दीजिए, साधन दीजिए।
बिहार की तरक्की का ध्यान करके शिक्षा को सुधारने के लिए लालू प्रसाद यादव जी की राजद सरकार ने 1990 में चरवाहा विद्यालय की स्थापना की थी। और यहीं से शिक्षा का बंटाधार हो गया। शिक्षा जैसे संवेदनशील विषय पर अल्पशिक्षित, अर्धशिक्षित और अशिक्षित लोगों ने संवेदनाहीन निर्णय लेना शुरु कर दिया। रही सही कसर दुःशासन बाबू के कुशिक्षित शिक्षाशत्रुओं (शिक्षामित्रों) ने पूरी कर दी।
ऐसा नहीं है कि सारे के सारे शिक्षामित्र अयोग्य ही हैं। उनमें से कुछ तो सर्वथा सुयोग्य हैं और वे किसी भी नियमित शिक्षक से अधिक निष्ठावान और परिश्रमी हैं। परंतु इनकी संख्या नगण्य है। अयोग्य, अकुशल, अशिक्षित, अक्षम और आलसियों की भरमार है। जब तक ये रिटायर नहीं होते हैं, तब तक बिहार की शिक्षा व्यवस्था और इसके स्तर में सुधार की कल्पना करना दिवास्वपन सदृश है।
जब तक अनपढ़ लोग पढ़ाते रहेंगे और डॉक्टर, इंजीनियर, प्रोफेसर, ग्रेजुएट, पोस्ट-ग्रेजुएट और पी-एच.डी. लोग; अनपढ़, अशिक्षित व अयोग्य लोगों को वोट देकर जिताते रहेंगे तब तक शिक्षाशत्रुओं और दुःशासनों से सकारात्मक परिणाम की उम्मीद रखना बेईमानी होगी। देखना यह है कि जनता अपने अमूल्य वोटों की असली कीमत कब तक पहचान पाती है!
- - -
डॉ. राजा राम यादव
13.12.2018
मुंबई
No comments:
Post a Comment